अपनी बात

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Friday, July 7, 2017

एक कटोरी चाँदनी एक कटोरी धूप (भाग १) : उमाकान्त शुक्ल के दोहे


समय तो लगा किन्तु इस बारअतिथि लेखकश्रृंखला में सुकवि श्री उमाकांत शुक्ल द्वारा रचित १४५ दोहे लेकर उपस्थिति हुआ हूँ जो भाषा, कथ्य और अभिव्यक्ति की दृष्टि से बेजोड़ हैं|

दोहों के लेखक मूलरूप से संस्कृत के कवि और साहित्य-शास्त्र के आचार्य हैं| हाल ही में आपने एक अभिनव प्रयोग प्रारम्भ किया जिसके अंतर्गत आप अपने फेसबुक टाइमलाइन पर नियमित रूप से कुछ दोहे लिखते हैं| दोहों के विषयों की विविधता चकित कर देने वाली है जिनका विस्तार रसराज श्रृंगार से लेकर अर्वाचीन युग में प्रचलित फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के माध्यम तक है| नीतिविषयक दोहों से लेकर नितांत भावुक अभिव्यक्तियाँ भी इस संग्रह में दिखाई देती हैं| एक-आध जगह हास्य और व्यंग्य के छींटे भी पाठक को गुदगुदा देते हैं| थीम पार्टियों पर कवि की पैनी नजर चकित कर देती है|

समय के रथचक्र की गति अपनी ही अराओं की विसंगतियों से बाधित हो रही है, ऐसे में सौन्दर्य और सौन्दर्यबोध दोनों को ही साधते हुए कवि ने सरल और सहज जीवन दर्शन को सरलतम अभिव्यक्तियों के माध्यम से सामने रखा है|

आज के समय में जब कविता का अर्थ अतिरंजना हो चला है, कविता वादों और आन्दोलनों के नारे जैसे शब्द-प्रधान होती जा रही है; ऐसे काल में विशुद्ध व्यंजनामय कवित्व के दर्शन करने के उद्देश्य से इन दोहों को आराम से बैठ कर पढ़ना और उनका मनन किया जाना चाहिए|

मैं अपना अनुभव कहूँ तो इन दोहों को पढ़ते हुए मुझे तो ऐसा लगा जैसे सर्दियों में सूखे पड़े हुए घास के मैदान में बैठे हुए अचानक चारों और हरियाली का एक वृत्त बन गया हो|

कविश्री उमाकांत शुक्ल
पत्रव्यवहार - ६०४ संजय मार्ग, नई मंडी, पटेल नगर, मुजफ्फर नगर| उत्तरप्रदेश|
फेसबुक यू आर एल  - https://www.facebook.com/umakant.shukla.58
मेल  - shukla_umakant@rediffmail.com
दूरभाष - +९१९९९७८३७०६२


एक कटोरी चाँदनी एक कटोरी धूप : उमाकान्त शुक्ल के दोहे

(१-६-२०१७ से ६-७-२०१७ तक प्रकाशित)

भटका शीर्षक गीत का ज्यों पीपल का पात।
झंझावातों में घिरा फिरता हूँ दिन रात।।१।।

बरगद मेरे गाँव का महामना ज्यों भूप।
सब को छाया बाँटता सिर पर बाँधे धूप।।२।।


एक कटोरी चाँदनी एक कटोरी धूप।
कविताई में ढल गया एक सलोना रूप।।३।।


सपन उचटती नीँद के नादाँ या कि शरीर।
आँखों को मुसकान दे गए अधर को पीर।।४।।


भैया हम तो प्यार के महके महके छंद।
शबनम या कि गुलाब हैं या पीड़ा-आनन्द।।५।।


बुकची में बंध पायगी क्या सुगन्ध मतिमन्द!
गन्धवाह के संग उसे उड़ने दे सानन्द।।६।।


छतरी बन छाया कभी कभी मशक बन नीर।
देते प्यारे श्याम घन हरो धरा की पीर।।७।।

बाग बगीचे जल रहे जंगल जंगल ताप।
उमड़ घुमड़ छाओ घटा बरसो काटो पाप।।८।।


उमड़ घुमड़ कर रामजी बरसो मेरे देस।
ताल तलैया भर उठें ज्यों हिय पिय संदेस।।९।।


उमड़ घुमड़ कर रामजी बरसे मेरे देस।
ताल तलैया भर उठे ज्यों हिय पिय संदेस।।१०।।


कब भरना कब बरसना जान रखो यह मित्र।
तुम कवि हो तुम अश्रु हो तुम हो मेघ पवित्र।।११।।


काश अटारी बैठ कर तुझसे होती बात।
तेरी सुनता मेघ कुछ अपनी कहता तात।।१२।।


अच्छा अब हूजै बिदा मेघ सलौने स्याम।
प्यास बुझाओ भुवन की बरसो मधुर ललाम।।१३।।


आँसू अर मुसकान के भरे होते रंग।
तो दाता तेरा जहाँ था कितना बदरंग।।१४।।


भूख हिन्दू मुसलमाँ भूख सिक्ख इसाइ।
भूख पंडित मौलवी भूख भूख है भाइ।।१५।।


साईं तू ने भूख की दी है जो सौगात।
उसे सम्हाल रखूँ कहाँ क्या मेरी औकात।।१६।।


अधर पटल पर तरल यों अश्रु बिन्दु स्वच्छंद।
ज्यों गुलाब के फूल पर शबनम या मकरंद।।१७।।

मूँगे पर तुमने धरा ज्यों मुकताहल एक।
घटित अधर पर अश्रु का हुआ राज्य अभिषेक।।१८।।

लो गुलाब के फूल पर झुका मोगरा एक।
अधर पांखुरी पर टिका ज्यों आँसू ढर एक।।१९।।

भीषण गरमी पड रही झुलस रहे हैं बाग।
नभ पानी धरती हवा सभी हवाले आग।।२०।।

बरफ गरम शरबत गरम सत्तू गरम उदास।
साहेब गरमी में उड़े सबके होश हवास।।२१।।

सता रहा था जगत को कान उमेठ-उमेठ।
पावस आती देख कर हुआ भगोड़ा जेठ।।२२।।


आग बबूला जेठजी किये बहुत उतपात।
गरजे दूत असाढ के जमा पिछाडी लात।।२३।।


नयन-सीप मुकताहल अधर-पाँखुरी फूल।
उसकी करुना-कोर के ये सब मंगल-मूल।।२४।।


साईं ने आँसू दिये साईं ने मुसकान।
हरा -भरा सौरभ -सना जिनसे लसै जहान।।२५।।


मन के कागद पर लिखा तूने जो प्रिय गीत।
उलट -पलट पढ बावले वह तो मन्त्र पुनीत।।२६।।


जीवन-मरुथल-डगर में नन्दन-वन की छाँव।
मंगल-भवन अमंगल-हर अम्माँ के पाँव।।२७।।


जब अम्माँ के संग थे तब की थी क्या बात।
दिन चाँदी के थे सभी सोने की थी रात।।२८।।


मां गंगा की धार है मां यमुना का कूल।
माँ मंगलमय आरती माँ पूजा के फूल।।२९।।


माँ मर्यादा प्यार की करुणा का आनंद।
पृथिवी की गुरुता गहन प्रेम-वल्लरी कंद।।३०।।


सोना मछली पकड ही लूँगा यह मन सोच।
फेंका जाल फँसे मगर कछुए मेंढक पोच।।३१।।


खुशबू पंख पसार कर उड़ा चाहती देख।
जाल तानने लग गये औचक भौचक शेख।।३२।।


फुर फुर उड़ना चाहती खुशबू खुले अकास।
उसकी यह हरकत उन्हे क्यूँ आएगी रास।।३३।।


सुरमेदानी रीतती यही गा रही गीत।
धीरे-धीरे खिसकते सभी जा रहे मीत।।३४।।

घूरे का उद्यान का या जंगल का भ्रात।
फूल गुलाब गुलाब है यह मत भूलो तात।।३५।।


साहेब की हो या कि हो वह चाकर की मित्र।
प्यास प्यास है प्यास का केवल प्यास चरित्र।।३६।।


रब की पाक निगाह में केवल एक अभेद।
बंदे यह तेरा करा धरा हुआ है भेद।।३७।।


अधर राग, काजल नयन, टिकली दी ज्यों भाल।
त्यों मानो शृंगार के टाँके छन्द सम्हाल।।३८।।


डाल कंठ में करधनी बाँध कमर में हार।
ठाट बाट रच चल दिए किधर कहो सरकार।।३९।।


या कि सींचिये प्यार से या कि डालिये काट।
हम चंदन के वृक्ष हैं सुरभि हमारा ठाट।।४०।।


स्वप्न उगते खेत में स्वप्न मिलते हाट।
मोल भाव इनका करे वो काँटा ना बाट।।४१।।


छोट बड़े के फेर में सब सुख खोया तात।
सब में एक विराजता समझ पड़ी अब बात।।४२।।


आँख फिरी आँखें लड़ीं आँख हुईं अब चार।
उनके बढ़ते प्यार के ये थे कुछ उपचार।।४३।।


आँख लाल क्यूँ कर रहे आँख सेकिये कांत।
उसे लगा कर आँख में रखिये वो है भ्रांत।।४४।।


अभी लगी थी आँख टुक उनका आया फोन।
भैया क्या प्रोग्राम है घर पर ही तो हो ।।४५।।


उनका आया नेवता ये ये धर पोशाक।
आओ शादी में मियाँ और जमाओ धाक।।४६।।


चिकनी चुपड़ी बात कर दोनों मिले तपाक।
मन में कुछ-कुछ चल रहा कुछ-कुछ वार्ता-पाक।।४७।।


मेरे फोटो की उसे तनिक थी दरकार।
फिर भी पठा दिये वहाँ एफबी से दो चार।।४८।।


देख कैमरा सामने ऐंड़ ऐंड़ श्रीमान।
बत्तीसी दिखला रहे भर नकली मुसकान।।४९।।


सीसीटीवी कैमरा लगा हुए हैरान।
घर दफतर लगने लगा चहल-पहल सुनसान।।५०।।


चिट्ठी पत्री गुम हुई चिट्ठीरसा फरार।
मोबाइल के राज में आया यार करार।।५१।।


राधा-माधव-साधना वाक-अर्थ की साध।
डूब इसी में पाइए मंजुल भाव अबाध।।५२।।


छोड़ नीड नभ में उड़ो गीत-विहग अक्लान्त।
तेरे-मेरे फेर से दूर निराकुल शान्त।।५३।।


मन छलका छलके नयन छलके भावुक छन्द।
हुआ असीम ससीम से जब अन्तर्-मकरन्द।।५४।।


माँ की यादों के सरिस और कोई याद।
तुहिनाचल पर आग की सेक भरा आस्वाद।।५५।।


माँ की यादों के सदृश दूजी कोइ याद।
जेठ दुपहरी बर्फ की सुखद हवा का स्वाद।।५६।।


माँ की यादों सा भला कहाँ और एहसास।
गर्मी वर्षा शीत का मिला जुला आभास।।५७।।


माँ की यादों की महक जैसी महक कहीं न।
पृथिवी की सौंधी महक जैसी महक सुनी न।।५८।।


उपमा माँ की ढूँढना भी है सोच पलीद।
वो तो शीरीनी सुखन पाक शर्बते दीद।।५९।।


रूपमाधुरी कान्ह की बाँकी अँकुड़ीदार।
झपकौही अँखियाँ मधुर मधुर अधर रतनार।।६४।।


फूटा कल्ला रूप का लाज सलौना रंग।
तिस पर मयन बखेड़िया हे हरि रखियो चंग।।६५।।


मैं व्यंजन तू स्वर हरे तुझसे मेरी चाल।
आकारित कर तू मुझे शब्द ब्रह्म में ढाल।।६६।।


भाव-खजाने में जिन्हें छिपा रखा था बंधु।
आँसू अपने आप वे छलके बन सिंधु।।६७।।


अंकित तेरे चित्त पर स्थायी जिसका रूप।
समझ वही है विश्व में पगले तत्त्व अनूप।।६८।।


प्राण एक मन एक कर उसने दी अँकवार।
एकादेशी संधि में दोनों एकाकार।।६९।।


भावुक मन भावुक नयन भावुक स्वप्न अमोल।
लो, पत्थर बाजार में आये बेंच अतोल।।७०।।


जो आँसू बन छलकती या कि ढुलकती यार।
उस मीठी सी पीर की कर तू साज सँवार।।७१।।


गीत गज़ल रोला कवित साखी दोहा छंद।
गोया राग विराग के निखरे बिखरे स्पंद।।७२।।


मेरे मन की आँच खा तेरा रूप सुवर्ण।
आखिरकार हुआ खरा सोना द्वादशवर्ण।।७३।।


कुर्ता फटा लगा लिया लो हमने पैवंद।
मन में उभरे घाव पर गो कि राग-रगबंद।।७४।।


नयन-कमल-दल खोलिये मुरगे ने दी बाँग।
खतम हुआ अब रात के सपनों का सब स्वाँग।।७५।।


करुणा-प्रिया लगाइये कंठ मोद भर गात।
जन-मानस सरसाइये यही दिव्य सौगात।।७६।।


पीर-पगे आनंद में मगन रहो दिन रैन।
झाड़पोंछ करते रहो चित्त पडेगा चैन।।७७।।


तू अपने संसार में फँस इतना मजबूर।
क्या जानेगा खैरियत मेरी तू मगरूर।।७८।।


अँखुआया है आज जो कल होगा वह रूख।
धूप हवा पानी बिना यूँ ही जाय सूख।।७९।।


अँकवारी भर ले उडो पवन उसे निज संग।

अभी नवोदित मेघ वह नादाँ करो तंग।।८०।।

मेंढक टर्राने लगे टर्राने दे यार।
उनका भी तेरी तरह वर्षा पर अधिकार।।८१।।


टूट टूट कर रामजी बरसो अब की बार।
धरती गहरे तक जली लाखों पड़ीं दरार।।८२।।


'कहो खैरियत' सुन हँसा हेर बादिले ज़ार।
उस रंगते कमाल की अँखियाँ शुक्रगुज़ार।।८३।।


पूछा सागर से कुशल-मंगल बोला तात।
रतन कभी जलचर कभी हैं मेरे हालात।।८४।।


काव्य सुधा रस में पगे या तुतलाते बोल।
हैं पावन जो कान में देते मिसरी घोल।।८५।।


मन छलके छलकें नयन छलकें भावुक छन्द।
कविता फूट बहे जहाँ वे प्रणम्य कवि चंद।।८६।।


ये दूर के सुहावने लगते चलिये भाग।
मरुथल हो कि समुद्र हो या परबत या आग।।८७।।


शुतुरमुर्ग मेरी व्यथा तू अपनी कर जान।
पंख दिये करतार ने पर छीन ली उड़ान।।८८।।


गरमी की भरमार है इस बारी तो लाल
रैन दिना बेचैन सब जीना हुआ मुहाल।।८९।।

छाया घर में जा घुसी बाहर फिरती धूप।
लुका छिपी का खेल यह देख रहा है कूप।।९०।।


गँवई पिलखन का मिरे दूर दूर तक नाँव।
पगड़ी बाँधे धूप की सब को बाँटे छाँव।।९१।।


रूख धूप के पहन कर उजले उजले टोप।
झाबा भर छाया गहें धूप दिखाती कोप।।९२।।


छत के ऊपर धूप अरु छत के नीचे छाँव
ओढ़ ओढ़नी सो रही छाँव पसारे पाँव।।९३।।


चिलमन से झाँकी निकल उसके तन की धूप।
पाढर बेला मोगरा दुपहरिया के रूप।।९४।।


भावुकता के भाव को उपचारों की भेंट।
चढा मन!अपनी सुना, तज सब लाग लपेट।।९५।।


प्रेम सुदामा विप्र है प्रेम द्वारकाधीश।
मधुर भाव तल्लीनता जहां विप्र ईश।।९६।।


प्रेम कुईं अरु चंद्रमा प्रेम कमल अरु सूर।
प्रेम चक्कवा चक्कवी प्रेम प्रवाह प्रपूर।।९७।।


जो तेरे रंग-रूप की चर्चा में मशगूल।
वो तेरी मधु गंध का कहाँ पारखी फूल!!९८।।


गरमी की भरमार है इस बारी तो लाल।
रैन दिना बेचैन सब जीना हुआ मुहाल।।९९।।

उफ गरमी ऊमस विकट अब बरसो मेह।
अंतर बाहिज ताप से जली जा रही देह।।१००।।


होते थे जो शहर में आँनद मंगल काज।
वे शिकार बस रस्म के बिना तुम्हारे आज।।१०१।।


जहाँ पड़ौसी के लिये फिकरमंद थे लोग।
अब वो शहर नही रहा लगा कौनसा रोग।।१०२।।


उत्सव जीने के लिये होते थे सुखमूल। 
अब वे छपने के लिये पकड़ रहे हैं तूल।।१०३।।


अब सहजता का मजा ले पाते हैं लोग।
ड्रैस कोड निरधार कर निबाहते सुख-सोग।।१०४।।


हाथ पाँव वाला कोई तोड़ ले गया नीड।
तिनका तिनका चोंच ले बुना रंगते मींड।।१०५।।


छायी मेघ घटा नभ घोर घोर चहुंओर।
उड़ी बलाका मोद भर नाच रहे वन मोर।।१०६।।

चपला अंकुश बूँद मद चढते मेघ करीन्द्र।
तड़क-भड़क झंझा भरे पुलकित काम महीन्द्र।।१०७।।


नगर गाँव भीगे सभी वन वाटिका प्रसन्न।
निर्मर्याद हुईं नदी विरही जन अवसन्न।।१०८।।


चातक चपल सुहावने हिरन राग मद मस्त।
मेंढक टर्राने लगे कोकिल कूक प्रशस्त।।१०९।।


यक्ष तुम्हारा कर रहा स्वागत प्रथम पयोद।
दूत बनो उसका करो मेघ विरह अपनोद।।११०।।


सभी सुखी प्रिय जन रहें प्रेयसिया हों धन्य।
तुम भी अपनी दामिनी संग उड़ो पर्जन्य।।१११।।


जिस पल जीवन का हुआ बीजाधान अखंड।
ठीक उसी पल मौत का बोया बीज प्रचंड।।११२।।


खींच खींच छोटी बड़ी स्याह सफेद लकीर।
मैं विराट था हो गया राजा रंक फकीर।।११३।।


जहर हलाहल चित्त में अधर मधुर मुसकान।
तेरी नटसारी अजब गजब खुदा हैरान।।११४।।


ऊँच नीच के फेर में उमर गँवाई खोय।
अब अरथी चढ़ चल दिया वहाँ जहाँ सब कोय।।११५।।


रोटी की दो परत हैं जीवन मरण समान।
एक साथ सिकती चलें कहती कुचुल सुजान।।११६।।


राधा-माधव-माधुरी-रस अखण्ड आनन्द।
नित्य सत्य सुंदर शिव परिमल परमानन्द।।११७।।


व्रज-मंडल-परमेश का लोना रूप ललाम।
राधा-पाद-सरोज पा लीला नित्य गुलाम।।११८।।


नील-श्वेत-कमलायतन झाँकी रुचिर अमोल।
या नीलम-मुकताहल-प्रभा-प्रपंच अतोल।।११९।।


कृष्ण-रूप भ्रमराभ श्री राधा हैं कुंदाभ।
दोनों बन आँखें लसें जन जन में उभयाभ।।१२०।।


राधा बाधा टालतीं हरि हरते सब ताप।
जोड़ी मधुर सुहावनी काटो जन के पाप।।१२१।।


सारी दुनिया की हँसी आँसू एक समान।
जाति -वर्ग की कल्पना का इनमें गुमान।।१२२।।


आँसू गंगाजल तरल ज्योत्स्ना मधु मुसकान।
कला-जगत इनके बिना भुतहा लगे मकान।।१२३।।


करुणा की नीराजना खुशियों का अभिषेक।
मनुआ ये सबके मते मौलिक कला-विवेक।।१२४।।


दुनिया के बाजार में तू होगा नीलाम।
सोच सोच गुम सुम हुआ साँसें रोक कलाम।।१२५।।


बोली बारह लाख की लगा रहा शैतान।
यों सुन बिफरी अनमनी ग़जल हुई हैरान।।१२६।।


खोज खोज हारा बहुत खूँदा निखिल जहान।
मिला मुझी में एक दिन साँई सर्व महान।।१२७।।


आज मुसकराया बहुत वो मुद्दत के बाद।
शायद लगा सँवारने खोई-खोई याद।।१२८।।


आँसू छलके क्या उसे आयी मेरी याद।
शुरू कहाँ से हुई हो कहाँ तलक मर्याद।।१२९।।


खिलें फूल बगिया हँसे महके पुलक वसंत।
हँसिये दु: बिसारिये जी!जीवन पर्यंत।।१३०।।


अब जब तू सुनता नहीं किसे सुनाऊँ बात।
क्या वह मेरे संग ही चली जाएगी तात।।१३१।।


तू रूखा जब से हुआ सारी रौनक बंद।
रूप सबद रस गंध अरु परस सभी में दुंद।।१३२।।


भैयाजी इस ओर है डाह उधर अभिमान।
बात निगोड़ी क्या बने क्या बिगड़े नादान।।१३३।।


था अजान सहृदय बना समुझवार था मौन।
करता कविताई तेरी कह सराहना कौन।।१३४।।


सबके आँसू पोंछता चल सबको दे हर्ष।
काव्य-मार्ग का तू पथिक पा जग में उत्कर्ष।।१३५।।


मुट्ठीभर आकाश है चुटकीभर सब भान।
खोल तोड़ बाहर निकल भर तू तनिक उड़ान।।१३६।।

योगदिवस (२१-०६-२०१७)

योगेश्वर श्रीकृष्ण की मनवा जै-जै बोल।
जिनका 'कर्मसु कौशलं' योग नित्यकल्लोल।।१३७।।


श्रीपातंजल योग की महिमा विश्वजनीन।
योगदिवस पर योग में दुनिया भाव विलीन।।१३८।।


समता राजे विश्व मेंयह कविता का योग।
छोट बडे़ की छोड़ रच समदर्शनसंयोग।।१३९।।


हम तो समतायोग के भैया रमते राम।
छाय मढैया प्यार की बैठ करें विश्राम।।१४०।।


सभी लोग हों सुख सने सभी लोग नीरोग।
सभी भद्र देखें सदा कोइ भोगे रोग।।१४१।।

पितृदिवस (१८-०६-२०१७)

पिता हमारे थे विपुल बरगद जैसे धीर।
घर आँगन को छाँव दे सही घाम की पीर।।१४२।।


बच्चों की उन्नति उन्हें उत्सव का आनन्द।
देती सदा इसी लिए थे वे ब्रह्मानंद।।१४३।।


छात्रों अर सन्तान में करते कभी भेद।
गये छोड़ उस लोक में एक यही है खेद।।१४४।।


उनकी स्मृतियों को नमन उनकी बातें वन्द्य।
उनके जीवन-सूत्र थे आस्था पगे अनिन्द्य।।१४५।।

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