अपनी बात

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Wednesday, April 26, 2017

भेंट ऑब्लिक मुठभेड़

फैशन का युग है| स्टेटस का दौर है| डिज़ाईनर जूते, कपड़े, घड़ियाँ, गाड़ियाँ, फर्नीचर और मकान आदि प्रचलन में हैं| इन सबके अलावा आजकल एक और चलन है, डिज़ाईनर बच्चों के उत्पादन का| अंतर इतना है कि बाकी सब चीज़ें शरीर पर या शरीर के आस-पास सजाई जाती हैं और बच्चे सभी जगह प्रदर्शित किये जाते हैं, विशिष्टता का भाव जगाते हैं| उन्हें कच्चे माल की तरह जन्मा जाता है फिर ‘ब्रांडेड’ संस्थाओं में ‘डिजाइनिंग’ और ‘ब्रांडिंग’ के लिए भेज दिया जाता है| वहाँ उनकी कटाई-छंटाई होती है, समय की ज़रुरत के हिसाब से सँवारा जाता है, और फिर बाज़ार में पेश कर दिया जाता है – सराहना पाने के लिए और स्वामी की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाने के लिए|
तो, बात को यों समझा जाए - मोटे तौर पर कारखाना, कारीगर, माल और माल के मालिक; ये निर्माण-प्रक्रिया की पूरी घटना से जुड़े होते होते हैं|
इस प्रक्रिया के विविध चरण होते हैं जिनका सिलसिलेवार वर्णन करना तो सिर्फ ब्रह्मा के ही वश का काम है| मुझ जैसा अदना सा कारीगर भला क्या खा कर इस बारे में लिखेगा| हाँ, एक काम है जिससे मेरा सीधा-सीधा सम्बन्ध है और जिससे जुड़े अपने अनुभव बाँटने की हिमाकत अवश्य कर सकता हूँ| वह काम है स्कूलों में होने वाली ‘पी. टी. एम्.’| जो लोग इस बला के बारे में अज्ञानी या अल्प(अ)ज्ञानी हों उनकी सुविधा के लिए पहले में इसके अर्थ का खुलासा किये देता हूँ –
अमूमन यह देखा गया कि लोग कारीगर को कुछ सामान बनाने का आदेश देते हैं और बीच-बीच में निर्माण कार्य की समीक्षा के लिए कार्यशाला का चक्कर लगाते रहते हैं| यहाँ ध्यान रखने वाली बात यह है कि प्राय: उनका उद्देश्य प्रक्रिया की समीक्षा नहीं रहा करता, उनका ख़ास लगाव तो उत्पाद्य सामग्री से भी नहीं होता| पूरा ध्यान तैयार माल के प्रभाव और उसकी बढ़ती-घटती कीमत पर ही लगा दिखाई दिया करता है| इसी बात को स्कूल के सन्दर्भ में देखिये| जो तस्वीर दिमाग में बनाती जा रही है, उसे ही ‘पेरेंट टीचर मीटिंग’ या ‘पी. टी. एम्.’ कहा जाता है|
अब जरा इस पी. टी. एम्. की एक बानगी भी देख ली जाए –
विद्यालय में उत्सव का माहौल था| तरह-तरह के लोग विद्यालय में आये हुए थे| गुरुजन अपने अपने कक्षों में विराजमान थे| अभिभावक एक-एक कर उनसे मिल रहे थे और अपने बालकों की प्रगति की जानकारी ले रहे थे|
एक बालक के साथ उसके माता-पिता ने अध्यापक के कक्ष में प्रवेश किया| अध्यापक गेहूँए रंग के, मँझोले ढांचे के व्यक्ति थे| झुकती हुई सी पीठ और उत्तमांग के खिचड़ी बाल उनके चारों ओर बेचारगी का माहौल तैयार कर रहे थे| बालक के पिता ऊँचे कद और भरी-पूरी काठी के पुरुष थे| कनपटी पर उगे थोड़े से सफ़ेद बाल, पीठ और गर्दन की ज़्यादा सी अकड़ के साथ मिलकर प्रभाव का अद्भुत मिश्रण तैयार किये दे रहे थे| एक हाथ में कीमती मोबाइल फोन और दूसरे हाथ में ५५५ का टिन व्यक्तित्व का आकर्षण बना हुआ था| पैरों में पेंसिल हील और हाथ में पर्स लिए माताजी शरीर से चिपके पतलून और गहरे काट की चोलीनुमा कमीज़ पहने थीं| उनका चेहरा तरह तरह के रंगों से और शरीर मदहोश कर देने वाली सुगंध से सराबोर था| खुले हुए केशों में गहरे भूरे रंग की लटें आधुनिकता का जयघोष कर रही थीं| बालक कोट, पतलून और टाई में सजा हुआ था| उसके चेहरे की दूधिया चमक करीने से संवारे गए बालों के साथ मिलकर उसके जन्मजात आभिजात्य को अनायास ही प्रकट कर रही थी|
चलिए, किसी तरह की गलत-फहमी न हो इसलिए बात और साफ़ कर दी जाए| अध्यापक के कक्ष में प्रवेश करने वाले लोग वास्तव में बालक के माता-पिता न होकर ‘सनी’ के ‘मॉम-डैड’ थे|
‘डैड’ ने आगे बढ़कर अध्यापक महोदय से हाथ मिलाया और सामने वाली कुर्सी पर जम गए| ‘मॉम’ ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया| उनके हावभाव से लग रहा था कि उन्होंने जीवन में पहली बार किसी कि नमस्कार किया था| उनके चेहरे पर कुछ ऐसा भाव टंका हुआ था जैसे वे नमस्कार के बदले में सामने बैठे डेढ़ पैसे के मास्टर से कृतज्ञता ज्ञापन की उम्मीद कर रही हों| इस औपचारिकता के बाद उन्होंने भी ‘हबी’ के बराबर में रखी कुर्सी पर स्वयं को नजाकत के साथ टिका दिया| दोनों ही स्कूल की मामूली सी कुर्सी पर असहजतापूर्ण अधिकार के साथ स्वयं को संभाल कर विराजमान थे| ‘सनी’ बराबर में ही खड़ा हुआ था|
अध्यापक ने अपना चश्मा सँभाला और बच्चे की अभ्यास पुस्तिका पिता के सामने बढ़ा दी| इसी बीच ‘डैड’ का फोन मधुर ध्वनि के साथ बज उठा| ‘डैड’ ने बंद की बंद पुस्तिका ‘मॉम’ की ओर सरका दी| फोन ज़रूरी था, इसलिए बात करना आवश्यक था| उन्होंने अध्यापक महोदय से फोन स्वीकार करने की अनुमति माँगी और उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना खड़े होकर फोन पर बातें करने लगे|
उधर, ‘मॉम’ काफी संजीदगी के साथ पन्ने पलटने लगीं| बीच-बीच में अध्यापक के लिखी हुई टिप्पणियों को बुदबुदा कर पढ़ती भी जाती थीं| गहन अवलोकन के बाद उन्होंने बच्चे के हस्तलेख पर संतोष और लिखित सामग्री पर गहरा असंतोष प्रकट किया| उन्होंने सूचित किया कि ‘सनी’ पिछले स्कूल में तो ‘नाइंटी परसैंट’ पाता था, पर यहाँ आने बाद न जाने उसकी हिन्दी को क्या हो गया है! सारा मामला अंकों के गणित पर आकर जम गया था| बच्चा कितना और कैसे सीख रहा था, यह मुद्दा अप्रासंगिक हो चला था|
अध्यापक महोदय ने दबे से स्वर में बालक की शिकायत करते हुए बताया कि एक दिन उन्होंने कक्षा में हिन्दी की अच्छी पुस्तकें पढ़ने के लाभ बताने की कोशिश की, तो बच्चे ने टका सा जवाब देते हुए उनसे कहा था, “सर, किताब पढ़ना मत सिखाइए, बता सकते हैं तो यह बताइये कि सारी दुनिया में बिकने लायक किताबें छापने के लिए पब्लिशिंग हाउस किस तरह खोला जा सकता है|”
‘मॉम’ के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी| उन्होंने ‘हबी’ को पुकारकर इस घटना की सूचना दी| ‘डैड’ ने अपनी भंगिमा से गर्व का भाव झलकाया और पुन: फोन पर बात करने लगे| बात करते-करते वे कमरे से बाहर चले गए| इधर ‘मॉम’ ने उपस्थित अवसर को बड़ी कुशलता से लपका| उन्होंने हिन्दी के अपने अल्पज्ञान की सूचना दी| बड़ी महिमा के साथ हिंदी में ‘सनी’ की मदद न कर पाने की अपनी मजबूरी को बखाना| हिन्दी की अपनी आनुवंशिक कमजोरी को हिन्दी में बच्चे की असंतोषजनक प्रगति का सबब बताया| अध्यापक महोदय हीनता के बोध से दबे जा रहे थे| उन्होंने मन ही मन उस घड़ी को कोसा जब भाषा-प्रेम के चक्कर में पड़कर हिन्दी के प्रचार-प्रसार का बीड़ा उठा लिया था|
‘मॉम’ पहचान गयी थीं कि अध्यापक महोदय हतप्रभ, हतवाक् और हतबुद्धि हो चुके हैं| उन्होंने हिन्दी-शिक्षण से जुड़े कुछ मूल्यवान सुझाव अध्यापक को दिए फिर पूर्ण भारतीयता से ‘सनी’ हुई विनम्रता के साथ हाथ जोड़कर चलने के लिए उठ खड़ी हुईं| ‘डैड’ ने चलते समय पुन: बहुत ठंडेपन के साथ अध्यापक महोदय से हाथ मिलाया और ‘सनी’ पर विशेष ध्यान देने का साधिकार आग्रह करते हुए कक्ष से बाहर जाने के लिए मुड़ गए|
जाँच, मुआयना और जायज़ा संपन्न हो गया था| प्रगति की रपट देख ली गयी थी| आवश्यक निर्देश दिये जा चुके थे| कार्य की प्रगति संतोषजनक थी| बस, उस समय की ही प्रतीक्षा थी जब मोनोग्राम लगकर जिन्स बाज़ार में पहुंचेगी और तहलका मचा देगी|



चित्र www.robertmittenmaier.com, www.vanseodesign.com, www.lelek1980.deviantart.com से साभार

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