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Sunday, October 1, 2017

एक कटोरी चाँदनी एक कटोरी धूप (भाग ४) : उमाकान्त शुक्ल के दोहे

कवि – श्री उमाकांत शुक्ल

पत्रव्यवहार - ६०४ संजय मार्गनई मंडीपटेल नगरमुजफ्फर नगरउत्तरप्रदेश|


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एक कटोरी चाँदनी एक कटोरी धूप (भाग ४)

२९-९-२०१७ से -१०-२०१७ तक प्रकाशित 

अंधकार में जल रहा लिये तुम्हारा स्नेह|
मैं दीपक हूँ आग हूँ माटी देह विदेह||५५१||

मनवा! कुटिलाई तजो सर्वनाश का मूल|
आर्जव से लहिये अमृत ब्रह्म सत्य अनुकूल||५५२||

शोक न बीती बात का कर आगे की सोच|
धर्म अर्थ यश प्राप्त कर उठ मन! बन मत पोच||५५३||

सारे तीरथ कर लिये पर मन! गई न डाह|
शुद्ध हृदय तीरथ परम कर अशुद्ध का दाह||५५४||

करुणा मन-इन्द्रिय-दमन सत्य अहिंसा प्रेम|
दया-भाव सबके लिये प्यारे! यह तप-नेम||५५५||

प्राणिमात्र के हेत कर मन से प्यारे! धर्म|
कैसे जन-कल्याण हो यही सोचना मर्म||५५६||

दरिया में बहते मिलें-बिछुडें ज्यों दो काठ|
त्यों तेरा मेरा रचा प्यारे!विधि ने ठाठ||५५७||

धर्म अकेले कीजिये भीड़-भाड़ तज लाल!|
केवल विधि को देखिये छोड़ सभी जंजाल||५५८||

अब न स्वाद की फिकिर है निंदा-स्तुति से दूर|
जो मिलता वो पा लिया लेते सुख भरपूर||५५९||

आशा तज, कर्तव्य कर, कर सच्चा व्यवहार|
मौत प्रतीक्षा कर रही कब कर बैठे वार||५६०||

पूजनी चिड़िया का राजा ब्रह्मदत्त को उपदेश 

(महाभारत,शान्तिपर्व,139)
फल पापी के पाप का मिलता दिखे न जान|
पुत्र पौत्र नाती उसे भोगेंगे अनजान||५६१||

शास्त्र परुषता सांत्वना धन उपाय जहँ मौन|
तहँ बाडव-सम कोप की आग बुझाए कौन||५६२||

प्रियजनविरहानलव्यथा अप्रिय जन का साथ|
जरा-व्याधि धन-हानि ये दुःख लोक के नाथ!||५६३||

पैरों में छाले पड़े दौड़ा फिरता भ्रान्त|
पीड़ा से बच पायगा कहाँ बैठ हो शान्त||५६४||

आँख दुखी फिरभी हवा का रुख कर अनजान|
दौड़ रहा किस फेर में तू मदांध इनसान||५६५||

पथ्य छोड़ जो खा रहा मूरख! नित्य अपथ्य|
क्या जीवन से हो चला द्वेष तुझे कह तथ्य||५६६||

थोड़े धन से भी धनी हो सकता मतिमान|
संयम कौशल दक्षता दिलवाते सम्मान||५६७||

जिसकी बोली कान में देती मिसरी घोल|
जो सुख-दुख में साथ दे भार्या वही अतोल||५६८||

जिसे देख कर सुख मिले अंतर- आत्मा तुष्ट|
वही पुत्र है इतर तो उदित हुआ ग्रह दुष्ट||५६९||

जिसके शासन में न हों बलात्कार के कांड|
जो दरिद्र को पालता राजा वही प्रकांड||५७०||

ब्रह्मदत्त! जिसकी प्रजा सहती दुःख अकूत|
या कर से पीड़ित रहे वो नृप पाप-प्रसूत||५७१||

भारद्वाज कणिक की कूटनीति

(महाभारत, शान्तिपर्व)
तू भूसी की आग के सरिस सुलगना भूल|
जल तेंदू के काठ-सा अरि-दल चाटे धूल||५७२||

नेकी नमकहराम की करो सदा उन्नीस|
आँख बदल लेगा करो अगर बीस में बीस||५७३||

दुश्मन के ढिग बैठिए और पूछिए खैर|
सकी कमियाँ आँकिए मन में ठाने बैर||५७४||

जो आशा बाँधे खड़ा हो काहिल मगरूर|
लोकलजीला भीरु या उसका लक्ष्य अपूर||५७५||

कछुए की नाईं सदा अपने छिद्र छिपाय|
अरि की कमियाँ ढूँढिए रहिए सिद्ध- उपाय||५७६||

बक से चिंतन,शेर से घात,स्यार से लूट|
सीख कला ये तीर ज्यों अरि पर पडिए टूट||५७७||

चौकन्ना मृगवत रहो थामो अपना चाप|
अंधा-बहरा बन रहो प्रगटो समय प्रताप||५७८||

अरे! अनागत सुखों की मन में आशा बाँध|
वर्तमान सुख त्याग कर पल्लू बाँध न आँध||५७९||

अविश्वस्त का कीजिए कभी नहीं विश्वास|
रहिए फिर विश्वस्त से भी चौकन्ना खास||५८०||

आग उधारी दुश्मनी इन्हे न छोडो शेष|
खतरनाक है छूटना कीजै इन्हे अशेष||५८१||

मित्र न कोई जन्म से शत्रु न कोई जात|
सब समर्थता-योग से शत्रु-मित्र की बात||५८२||

अरि की अगवानी करो दे प्रणाम उपहार|
मौका पडने पर करो भर कर तीखा वार||५८३||

कपोतकृत भार्याप्रशंसा

पुत्र पतोहू पौत्र हों नौकर-चाकर लोग|
घर लगता भार्या बिना सूना मानस रोग||५८४||

ईंट लकड़ियों से नहीं गृहिणी से घर सिद्ध|
उसके रहते ही भवन लगता भाव-समृद्ध||५८५||

प्रेम-पुंज सुख-दु:ख में पति की गति मति एक|
भार्या ही जिस पर टिका पूरा कुटुम-विवेक||५८६||

भार्या भावमयी सदा भूख-प्यास का ध्यान|
रखती नित्य मनस्विनी मानवता की शान||५८७||

भार्या का गर साथ तो जंगल भी प्रासाद|
बिन उसके प्रासाद भी बस जंगल अवसाद||५८८||

भार्या देश-विदेश में प्राणवंत विश्वास|
जिससे भर्ता के सदा सार्थक सब आयास||५८९||

भार्या एक त्रिवर्ग की महीयसी अनुरक्ति|
लोक-भावना की वही स्फूर्ति शक्ति अरु भक्ति||५९०||

भार्या चेतन भावना पति की गति मति शुद्ध|
वही प्रेम-परिकल्पना परिणति भाव विशुद्ध||५९१||

ज्यों रोगी की ओषधी तंदुरुस्त की भूख|
त्यों मानव की गेहिनी प्राण-मयंक-मयूख||५९२||

जिसके घरवाली नही मंजुल मंगल मोद|
वो अरण्य में जा बसे वन ही उसकी गोद||५९३||

भार्या सा बांधव नहीं भार्या सा न सहाय|
भार्या सा आश्रय नहीं भार्या सा न उपाय||५९४||
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लोभ पाप का मूल है लोभ अलक्षित ग्राह|
तुझे निगलता जा रहा कर आतम परवाह||५९५||

होते पैदा लोभ से काम क्रोध छल छद्म|
यह वो रवि जिससे खिलें पाप-पुंज के पद्म||५९६||

जान न पाए लोभ का मौलिक अंतिम रूप|
देव असुर गंधर्व सब मौन त्रिलोकी-भूप||५९७||

इन्द्रिय-गण के वेग को वो करता दुर्वार्य|
सिर चढ लोभ मनुष्य का मृत्युदूत अनिवार्य||५९८||

तृष्णा से भरता नहीं कभी लोभ का पेट|
बढ़ता दिखता सिंधु क्या नदी समेट लपेट||५९९||

लोभ बढ़ाता तिश्नगी ऐंठ द्रोह अभिमान|
इसे ओट कर जगत में किसे मिला सम्मान||६००||

शास्त्र कंठ में धार कर जो देता उद्बोध|
खिंचा लोभ से वो दिखा दुर्मेधा दुर्बोध||६०१||

क्रूरहृदय बाहिज मधुर तृणाच्छन्न ज्यों कूप|
लोभी जग को छल रहा धर धर न्यारे रूप||६०२||

पंथ निकाल नये नये छल जनता को नित्य|
लोभ लांघ सीमा सभी करता काले कृत्य||६०३||

पापमग्न आकंठ हो लोभी नित्य- अशिष्ट|
ठगता साधु-समाज को धर धर रूप विशिष्ट||६०४||

डूब लोभ में सींचते जो अनर्थ का मूल|
दर्प क्रोध मद शोक के वे पाते फल- फूल||६०५||

लोभ मोह को जीतिये कर आयास प्रयास|
यहाँ पिशुनता डाह अरु द्रोह दंभ का वास||६०६||

माननीय की रीति का क्या कीजिये बखान|
कालकूट को दे दिया अजी! रतन का मान||६०७||

एक कटोरी दूध भी ले पाया न बजार|
छीराम्बुधि में सो रहे लछमी-संग मुरार||६०८||

ऊँचे जन के दोष भी पाते लाड़- दुलार|
सिंधु-जात हालाहल कंठ धरें त्रिपुरार||६०९||

गिन सकते तूफान में धूलि-कणों को आप|
वो संवेदन पाइये जो मापे मन-ताप||६१०||

मरुथल को तो देदिया तूने जल भरपूर|
घन! चातक की चोंच से प्यास रह गयी दूर||६११||

तू बडवानल का तथा मैं पीड़ा का ताप|
झेलेंगे कब तक बता सागर!यह अभिशाप||६१२||

अधरों पर आंसू उगा आंखों में मुसकान|
उसके भावों का गजब विनिमय कृपानिधान!||६१३||

अपनी बीती पर अगर तात!करूँ कुछ गौर|
खोना पछताना यही पाता हूँ सब ठौर||६१४||

जो होना था हो चुका उसका रोना छोड़|
मन! नेकी की राह पर चल अब घोड़ा मोड़||६१५||

क्या सोता निहचिंत हो जाग सके तो जाग|
देख उसे सिर पर खड़ी छोड़ घृणा मन! राग||६१६||

नृप न छीन सकता जिसे चुरा न सकता चोर|
मरने पर भी साथ दे मन! वो धर्म बटोर||६१७||

शीलहीन की संपदा क्षणिक तडित- सम जान|
कहाँ भोग सकता उसे तू मन! बड़ा अजान||६१८||

ऊँच-नीच अच्छा- बुरा त्याग लगाना घात|
आत्मोन्नति- अनुकूल जो हित मन! कर वो बात||६१९||

डेरे आश्रम में कहाँ धर्म और गुरु मूढ!|
सत्य धर्म का मूल मन! मात-पिता गुरु गूढ||६२०||

मृत्यु अंत है जन्म का संग्रह का क्षय अंत|
पतन अंत उत्थान का विरह मिलन काअंत||६२१||

पंडित का बल ज्ञान है नारी का सौंदर्य|
कविता का कमनीयता सत्ता का ऐश्वर्य||६२२||

सभी इंद्रियाँ छोड़कर गयीं गया मन प्रान|
आतम गया अनंत में माटी पड़ी अजान||६२३||

जन्मदिन की मंगल कामना

आज जन्मदिन आपका मंगलमय सुपुनीत|
आनँद मंगल कीजिये संग सखीजन प्रीत||६२४||
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चलने दे भवितव्यता का मंचन अविराम|
सूत्रधार के हाथ है नाट्यविधान तमाम||६२५||

क्रोध हर्ष आसक्ति या शोक मोह का भान|
छूता जिसे न वो मनुज बस हिमवंत समान||६२६||

कल्याणी मधु भावना का निदान है ज्ञान|
वही शांति का मूल है वही चरम विज्ञान||६२७||

सब नश्वर यदि तब भला क्या विनष्ट का शोक|
रूप शांति धन आयु का सुख यदि चित्त विशोक||६२८||

शक्ति ईश्वरी भावना कल्याणी गर साथ|
हानि-लाभ जीवन-मरण सुख-दुख चंदन माथ||६२९||

शोक-समंदर पीजिये बन अगस्त्य मुनिराज|
सत्त्व-समुद्भव निरखिये विदलित दु:ख-समाज||६३०||

शिक्षकदिवस

बहुत याद आते सदा गुरु-जन-पद-पाथोज|
जिनके पुण्य प्रताप से मिलता भोजन रोज||६३१||
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राहगीर कितने मिले करते ठेलाठेल|
कुछ छूटे चलते बने कुछ रह गये अकेल||६३२||


लमहा-लमहा उम्र का कहाँ खोगया यार|
निकला था कल खोजने पा न सका पर पार||६३३||

धनी निस्व बलवान या निर्बल रूप कुरूप|
काल सभी पर एकसा मँडरा रहा अनूप||६३४||

'मैं सास्तर आचार्ज हूँ दानी तपसी' बाल!|
छोड़ वहम छूटा कहाँ जरा-मृत्यु का जाल||६३५||

शीशी-पुडिया रह गयीं पड़ी उड़ गया हंस|
कहाँ गया कैसे गया छोड़ चला सब संस||६३६||

एकबारगी सामने आजाती गर मौत|
बढ़कर उससे पूछता बोल तिरा क्या ब्यौंत||६३७||

पल-पल बढ़ती जिंदगी पल-पल बढती मौत|
कैसी हिलमिल झूलती झूला दोनो सौत||६३८||

संग-संग चलना यही है जीवन की धार|
एकाकी रह जायगा जीव मृत्यु के द्वार||६३९||

जीवन-रथ सुख-दुःख के पहियों पर गतिमान|
तू केवल सुख चाहता लगता बेईमान||६४०||

दुख में सुख की कल्पना सुख में दुख का बोध|
इक दूजे का बोल ये कब करते प्रतिरोध||६४१||

उनका धंधा बढ रहा ज्यों गरीब की भूख|
पर करुणा की भावना-नदी चुकी है सूख||६४२||

भूख लगाती ओषधी वही पचाती अन्न|
मित्र-दोस्त कहते हुआ अब तू धन-संपन्न||६४३||

माँ ममता की मूर्ति है माँ अनुशासन पर्व|
माँ सनेह स्रोतस्विनी माँ वरदान अखर्व||६४४||

तू असार संसार में खोज रहा सुख-सार|
इस बाजारू निपिल में कहाँ दूध की धार||६४५||

मैं मेरा के जाल से आ बाहर नादान|
स्नेह-शून्य दीपक सरिस पा अविकल निर्वान||६४६||

गाँठ मोह की कस रहा ज्यों- ज्यों प्यारे लाल|
त्यों- त्यों काँटों के विकट बुनता पुख्ता जाल||६४७||

आँधी-तूफाँ-वासना फँसी नाव मजधार|
चिर-विराग-मल्लाह ही कर सकता उद्धार||६४८||

बचपन खोया खेल में यौवन कामासक्त|
फँसा बुढ़ापा रोग तब होगा खाक विरक्त||६४९||

बचपन अज्ञानी निपट यौवन कामाचार|
पीरी आयी अब कहाँ आतम तत्त विचार||६५०||

समझ रहा था तू जिसे नाकाबिले ज़वाल|
नाज़नीन तेरी हुई पुर सूरते बवाल||६५२||

आसमान को तान कर सोता भूमि-पलंग|
भीख मिली तो खा लिया तुझसा कौन मलंग||६५३||

उड़ चल मन!साकेत प्रिय! या उड़ चल उज्जैन|
अनुभव कर परमात्म सुख जहाँ मूक सब बैन||६५४||

उड़ चल मन! काशी पुरी या वृन्दावन धाम|
उमारमण शंकरचरण या भज राधे श्याम||६५५||

माया छूटी तज कलुष शिव शिव आत्मानंद|
राम राम राधारमण भज मन! परमानंद||६५६||

मोह गया निर्मल हुआ अब मनुआ! निःसंग|
पंच तत्त्व से ले विदा हो नित आतमसंग||६५७||

अब विषयों की कामना तज मन! हो नीरोग|
निरुपाधिक आनंद का नित कर निरुपम भोग||६५८||

पाप-पुण्य माया-जनित मोह कटा परमाप्त!|
विधि-निषेध का खेल ही लो हो चुका समाप्त||६५९||

श्याम रंग हावी हुआ सब रंगों पर एक|
मन उजला उजला सकल लगी उसी की टेक||६६०||

अब मन तेरे राग में डूबा हे श्रीरंग!|
तेरे रँग के सामने सब दुनिया बेरंग||६६१||

वैराग्य-तरंगिणी (१)

नर-पशु-जन की कर चुका चाटुकारिता खूब|
मन! अब विषयानंद तज परानंद में डूब||६६२||

मन! अब परमानंद में डूब सुमिर हरिनाम|
बहुत समय खोया न कर टालमटूल तमाम||६६३||

खूब गँवाई उमरिया मन! रह विषयासक्त|
होजा अब रघुनाथ के चरणों में अनुरक्त||६६४||

महाकाल को कर नमन धो मन की सब मैल|
वे त्रिकाल की जानते परानंद घन शैल||६६५||

वृंदावन यमुना पुलिन मुरलीधर गोपाल|
भज राधावल्लभ मना! मंजु बिहारीलाल||६६६||

काशी चल मनुआ! विमल गंगाजी रमणीक|
विश्वनाथ! काशीपते! रट छँट पाप- अनीक||६६७||

अहंकार! अंतिम नमन पाप-पुंज! हो दूर|
निंदारस! चल हट परे डाह! छोड़ रुज कूर||६६८||

शृंगारादिक तुच्छ सब मन! विराग रसराज|
कौड़ी कहाँ कदर्य की कहँ उदात्त पुखराज||६६९||

वैराग्य - तरंगिणी (२)

लोचन खोल रहा इधर उधर कर रहा बंद|
यम खिलकौरी कर रहा सावधान मतिमंद!||६७०||

जीवन दो दिन चार दिन सपना-सा कविराज!|
धन-दौलत बादल-सरिस अस्थिर पंडितराज!||६७१||

यह संसार असीम है चलाचली का खेल|
चले गये कुछ जारहे कुछ जायँगे अकेल||६७२||

लूट रहा है तू इसे काट रहा वो जेब|
सब जाएँगे अकडता क्या तू औरंगजेब!||६७३||

महल-दुमहले आसमाँ से करते जो बात|
मानो वे परलोक की करते तहकीकात||६७४||

मौत मूल है जगत का जीवन विकृति-समान|
क्या करने आया यहाँ करता क्या तू जान||६७५||

मेरी धन-दौलत घनी मेरा ज्ञान अनंत|
तज अभिमान न जायगा साथ तिरे भगवंत!||६७६||

उम्र असीम कहाँ सभी धन-दौलत काअंत|
यही सत्य है काल का नियम बड़ा बलवंत||६७७||

आया था संसार में तू करने विश्राम|
कर आगे के सफर के हेत सुमंगल काम||६७८||

दोहा कह पाया नहीं सिर पर चढा बुखार|
सहृदय जन को दे नहीं सका काव्य-उपहार||६७९||

यादें जीवन-वाटिका की सौरभ कुछ शूल|
जिनके बल खिलता लगे मानव मन का फूल||६८०||

सभी आश्रमों में प्रमुख है गृहस्थ का नाम|
सुख-दुख में मिलजुल सभी साधें अपने काम||६८१||

हिन्दीदिवस २०१७

निज भाषा अवमानना सर्व उपक्षय मूल|
निज भाषा संभावना भव्य भाव अनुकूल||६८२||

जो रोटी में गंध है वो न ब्रैड में तात|
पोरिज में दिखती न वो जो दलिया में बात||६८३||

अपनी हिन्दी से करो दिलो जान से प्यार|
जो भावों का है मधुर मंजुल रस - त्यौहार||६८४||
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कर्मभूमि में जन्म ले करिये उत्तम काम|
स्वार्थ साधने की कथा का न कहीं विश्राम||६८५||

अपनी बननी बिगड़नी जग से रखिये गोय|
चुप-चुप अपने लक्ष्य को साधे सब सिधि होय||६८६||

पवन दौड़ता कालवश वर्षा काल अधीन|
मौसम काल बँधे चलें काल परम स्वाधीन||६८७||

केवल शब्दों से नदी कर न सकेगा पार|
कर प्रयास संतरण का यही सिद्धि का द्वार||६८८||

गंगाजी के पुलिन पर सहज सरल अविराम|
कहाँ स्वर्ग मे पाइये वह सुख-संपति राम!||६८९||

आत्म-समुन्नति कीजिए तजिए ओछे कर्म|
सब धर्मों का सार यह यही शास्त्र का मर्म||६९०||

सद्गुण की अभ्यर्थना दुर्गुण का परिहान|
यही आत्म-विस्तार की पगडंडी पहिचान||६९१||

तपोमार्ग सब के लिए खुला चलो सुविचार|
कपट छद्म छल वंचना का न रंच अभिचार||६९२||

निन्दा की कथनी बुरी सुननी दूषण जान|
यह खल जन का पंथ है कहते संत महान||६९३||

सदाचार इक धर्म है सब धर्मों का मूल|
झगड़ा टंटा छोड़कर सभी बनें अनुकूल||६९४||

जिससे होकर वे गये गुनी मुनी जन संत|
वही मार्ग अपनाइए तजिए भटकन कंत||६९५||

शिव के पावन अंक में राजित ज्यों दो पद्म|
उमा-चरण संसार का दूर करें छल छद्म||६९६||

डोल रहा हरि-मन निरख जिसे निरंतर धीर|
पद्मा कुच मंगल कलस युगल हरे जन- पीर||६९७||

राघव-प्रेम-परायणा भरे भावना स्फूर्ति|
सीता नारी जगत की करुणा-वरुणा मूर्ति||६९८||

जिनके बिना न कान्ह का चरित दीखता पूर्ण|
वे राधा जग की व्यथा दूर करें संपूर्ण||६९९||

है अपूर्व यह भारती! तेरा रचा विधान|
सीमित स्वर-व्यंजन अमित काव्य-प्रकार वितान||७००||

तेरे कृपा-कटाक्ष से रसभावादिक-सार्थ|
साध साध कविता करें कवि-जन दिव्य-पदार्थ||७०१||

नित्य हो रहा शारदे! खर्च तुम्हारा कोष|
पर बढ़ता ही जा रहा कैसा सुख परितोष||७०२||

कुंदधवल मातः सरस्वति! तेरा करुणार्द्र|
चित्त कृपा मुझ पर करे रहूँ सदा भावार्द्र||७०३||

वीणा पुस्तक मालिका और अभय का हाथ|
तेरा धन तू शारदे! मुझको दे निज साथ||७०४||

शुभ्रवसन शुभ्रानना शुभ्रहंस- आरूढ|
माँ शारदे! करो कृपा रहूँ न जिससे मूढ||७०५||

ब्रह्म

नाम-रूप जिसका नहीं जो कण-कण में व्याप्त|
स्वानुभूति से मेय वो परब्रह्म परमाप्त||७०६||

गणेशजी का अनुशय

पी न सका द्विपभाव से माँ मै तेरा स्तन्य|
इसी लिए विधि ने लिखा मेरे हिस्से वन्य||७०७||
(द्विपभाव=दो, सूँड और मुँह से पीना, स्तन्य=दूध, वन्य=वन में उत्पन्न पदार्थ)

पार्वती का शिव को ताना

छोटे-मोटे साँप ले क्या इतराते नाथ!|
शेष नाग पर सो रहे हरि लक्ष्मी के साथ||७०८||

कवि का प्रश्न

गणपति धोती पहनते उमा पहनतीं पाट|
भोले! तुम आशावसन रचते कैसा ठाट||७०९||

देवताओं की ठिठोली

ब्रह्मा हरि हर देखिए शाला गये कहीं न|
मिला न इनको दाखिला माता-पिता-विहीन||७१०||

देवदत्त! समदर्शिता लाओ मन में नित्य|
हानि-लाभ सुख-दुःख से परे करो सतकृत्य||७११||

लोभ-मोह से दूर जो सत्य-सरलता-मूर्ति|
बाहर-भीतर एक जो उनसे लीजै स्फूर्ति||७१२||

जो स्वभाव से हैं सरल पाखंडों से दूर|
क्रोध शोक भय से परे उनमें रब का नूर||७१३||

अर्थ काम की साध के लिये धर्म का राग|
जो भरते धर्मध्वजी पगले! उनसे भाग||७१४||

ये कैसे धरमातमा पैसा जिनका लक्ष्य|
कामी कपटी खोखले खाते भक्ष्याभक्ष्य||७१५||

लिया आसरा धर्म का करने लगे अधर्म|
बाहिज आडंबर धरे भीतर लाख कुकर्म||७१६||

मन की गाँठें खोलिए रखिए इसे विशुद्ध|
प्रिय- अप्रिय के फेर से ऊपर उठिए बुद्ध||७१६||

उद्वेजक कर्कश वचन कभी न बोलो तात|
इससे मन रहता सदा मृदुल मसृण अवदात||७१७||

बाग-बाण से बीँध कर दे न किसी को शोक|
बाँट स्निग्धता मधुरता खेद न व्यापे लोक||७१८||

कटुवादी की तात! तू करता चल सब माफ|
मन तेरा निर्मल रहे सोच रहेगा साफ||७१९||

क्रोध जीतिए क्षमा से बिना क्रोध मन शुद्ध|
क्षमाशील के पास सब पुण्य-प्रभाव प्रबुद्ध||७२०||

वो गाली देकर गया तनिक न कर परवाह|
क्षमा सत्य करुणा तिरा आर्जव पुण्य-प्रवाह||७२१||

ज्ञानसार अवितथ वचन सत्यसार दम जान|
इन्द्रिय-निग्रह से सुलभ मोक्ष परम विज्ञान||७२२||

रसने! साधो मौन या बोलो सार्थक बोल|
सत्य मधुर धर्मानुगा वाणी वाक अमोल||७२३||

पा अवमान सुखी रहो ज्यों पीया पीयूख|
मन! अवमन्ता को कहाँ सुख अवकेशी रूख||७२४||

वेद-शास्त्र कंठस्थ हैं तत्त्व न उनका ज्ञात|
पंडितजी! उस ज्ञान से कैसे मिले नजात||७२५||

स्वर्गकाम हूँ मैं मगर भरा प्रपंच गरूर|
सत्य-साधना के बिना स्वर्ग दूर अति दूर||७२६||

है गर क्रोध न सफलता मिल पाएगी राम!|
रिजुता मन में ला तभी बन पाएंगे काम||७२७||

हानि-लाभ जीवन लगे लगे चढाव उतार|
घटता-बढता चंद्रमा सागर भाटा ज्वार||७२८||

जब तक है उपशम तभी तक संयत है जीव|
उपशम छोड़ कषाय के फंदे चढा अतीव||७२९||

सारी ब्राह्मी सृष्टि में बसा जु उसको देख|
वही तत्त्व परमात्म है शेष ऊपरी भेख||७३०||

जन-जन से कर प्यार तू द्वेष-भावना छोड़|
सारे धर्मों का यही केवल एक निचोड़||७३१||

ब्रह्मा से भी है बड़ा कवि! तू सिरजनहार|
तेरी सृष्टि रसोज्ज्वला शीतल ज्यों घनसार||७३२||

तेरे वचनों पर टिकी लोक-प्रवृत्ति मनोज्ञ|
इसी लिये तुझ पर धरा कवि! रसभार सुयोग्य||७३३||

रच-रच मंजुल सूक्तियाँ दे जीवन को धार|
कवि! रस-भाव-प्रपंच का तू दिग्दर्शन-सार||७३४||

शब्द-अर्थ मंगल-कलस सूक्ति-सुधा-परिपूर्ण|
दोनो मिलकर काव्य हैं एक भाव-संपूर्ण||७३५||

कवि! उत्पादक काव्य का सहृदय! भावक सत्त्व|
तुम दोनों जयशील हो सरस्वती के तत्त्व||७३६||

कवि! उत्पादक शक्ति से रच तू काव्य- प्रबंध|
सहृदय! भावक शक्ति से ले तू उसकी गंध||७३७||

पूर्व रूप कवि भासता सहृदय उत्तर जान|
प्रतिभा उनकी संधि है अरु कविता संधान||७३८||

जो देवी कवितामयी निखिल जगत में व्याप्त|
सादर नमन उसे जहाँ सब वैषम्य समाप्त||७३९||

अवसर पा पढ़ लीजिए मंजु सुभाषित एक|
सरस्वती का होगया लो मंगल अभिषेक||७४०||

सब आभूषण हैं वृथा रखिए एक सुधार|
मुक्ताहल-अवदात मुख-चारु सुभाषित-हार||७४१||

जो सुवर्ण से हों गढे निगम-सूत्र रस-भार|
धन्य जनों के कंठ वे लसें सूक्ति-मणि-हार||७४२||

यदि कवित्व-रस से नहीं भीगे तन मन प्रान|
तहाँ न जा जहँ चल रहा सूक्ति-सुधा-रसपान||७४३||

मौका मिलने पर न जो पढ पाता हो सूक्ति|
भला यही रस-मार्ग से वह जन पा ले मुक्ति||७४४||

गढिए मंजु सुवर्ण का कर्णाभरण सुजान|
जिसे धार सहृदय सजें पाएँ कवि जन मान||७४५||

सूक्ति-चषक भर दीजिए कविवर! रसपरिपोष|
मानस का इससे कहाँ इतर सघन परितोष||७४६||

काव्य-लता का मंजुतम सूक्ति-कुसुम- अनुबंध|
लगा सके उस पर भला कब कोई प्रतिबंध||७४७||

तनया दिवस २०१७

बिटिया आनँद-चंद्रिका बिटिया सुमन-सुगंध|
बिटिया गुड़िया प्यार की मधुर-भावना-बंध||७४८||

बिटिया आत्मा की खुशी कानों का संगीत|
वो आँखों की रौशनी वो एहसास पुनीत||७४९||

मात-पिता की साधना वो उनका अभिमान|
दो वंशों को जोड़नेवाली कडी महान||७५०||

बिटिया दुनिया में न गर आयी होती जान|
लगता रूखा बेसुरा बेरँग सून जहान||७५१||
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विद्वज्जन के ज्ञान को करिये सदा प्रणाम|
जिसके आगे तुच्छ हैं भौतिक विभव तमाम||७५२||

ऐसा चतुर न आजतक हुआ विश्व में चोर|
औरों की विद्या चुरा जो हो पंडित घोर||७५३||

अधरों की लाली चुरा ले काजल की कोर|
पर तू दौलत ज्ञान की चुरा न सकता चोर!||७५४||

विद्या के व्यय से नहीं होगा तू धनहीन|
यह वो धन जो व्यय किए रहता नित्य नवीन||७५५||

विद्या से जग का करो सदा मित्र! उपकार|
यह ऐसा धन है जिसे कभी न सकते हार||७५६||

यदि विद्या है पास तो भूखा रहे न पेट|
जो परमावश्यक नहीं उसे न यार! समेट||७५७||

विद्या है मंगल-भवन विद्या नित त्यौहार|
विद्या गौरव मनुज का विद्या सद्व्यौहार||७५८||

विद्या आभूषण सुभग विद्या रतन मनोज्ञ|
विद्या मंडन देह का आत्मोन्नति के योग्य||७५९||

विद्या बिना न मिल सकेगी इज्जत श्रीमान|
लक्ष्मी ठहरी चंचला विद्या स्थायी जान||७६०||

विद्या के ही रूप हैं ज्ञान और विज्ञान|
इनका अर्जन कीजिए पाएँगे सन्मान||७६१||

वही पुरातन शब्द हैं वही पुरातन अर्थ|
ढल कविता में चारुता से होते अन्वर्थ||७६२||

कविता जाग्रत चेतना चित्त-वृत्ति का राग|
द्रवणशीलता भाव की उल्लासी अनुराग||७६३||

अनभिजात अभिजात कृत सब कविता आस्वाद्य|
राजा-रंक न देखता आम सभी का स्वाद्य||७६४||

काव्य-वाक्य-संगुम्फना-मंजुल-कला-प्रवीन|
सत्कविजन की कीर्ति ही रहती सदा नवीन||७६५||

काव्यामृत पड़ कान में देता मिसरी घोल|
वंदनीय कवि-सार्थ के प्यारे मीठे बोल||७६६||

सहृदय-जन की गोष्ठियों में प्रस्तुत कवि-वाक|
जीती उठती नाचती पा यौवन-परिपाक||७६७||

कविता सहृदय-प्रीति की मूल चेतना मुग्ध|
कामधेनु की बानगी लिये अमल रस-दुग्ध||७६८||

कविता वनिता मालिका लग सहृदय के कंठ|
हर्षाती फबती सरस नित रहती सोत्कंठ||७६९||

सहृदय-जन ही काव्य के परिचर्या-तत्त्वज्ञ|
गंधवाह ही गंध का संवाहन-मर्मज्ञ||७७०||

रचिये दोहा सोरठा छप्पय गज़ल कवित्त|
जब तक हैं संसार में सहृदय चेतन-चित्त||७७१||

बिखरे मोती पोइए एक सूत्र में मीत!|
एकावली बनाइए सहृदय-हृदय पुनीत||७७२||

जाति धर्म पूजा प्रथा पंथ वर्ण अनुयोग|
टुकड़ा टुकड़ा दीखते इतना बिखरे लोग||७७३||

स्वप्न देखने से मुझे मत रोकिए जनाब!|
रात हसीँ यादें हसीँ दूँ क्या और जवाब||७७४||

तूफाँ की परवा न कर विहग! न हो गमगीन|
नीड बना दुनिया बसा सजा सपन रंगीन||७७५||

कुछ मुसकाया हँस दिया बोला मीठा झूठ|
वो गौहर- अफ्शाँ मिरा जिया ले गया लूट||७७६||

होंठों पर जूही- हँसी दिल में अगन प्रचंड|
मैं हूँ तेरी शायरी सुन तूफाँ बरबंड!||७७७||

दुनिया फूल गुलाब है रंग रूप अरु खार|
तनिक देखिए परखिए क्या नीरस क्या सार||७७८||

बाहों में तूफान भरलेने की थी चाह|
मैं सूखा पत्ता बना उड़ता उसमें वाह||७७९||

मुझे ढूँढने में लगा रहा कहाँ तू मूढ!|
लकड़ी पत्थर ईंट वे मैं हूँ तुझमें गूढ||७८०||

कृत्रिम शिष्टाचार के डाल कंठ में हार।
छाती से छाती लगा मिले न पर इकतार||७८१||

पीड़ाओं से प्यार है इसीलिए हे स्वान्त|
तू दुनिया में रम रहा तनिक नहीं उद्भ्रान्त||७८२||

यद्यपि कड़वा बोलता पर कहता हित तात!|
शादी की गाली-सरिस मीठी उसकी बात||७८३||

संतों के व्यवहार ही बन जाते हैं शास्त्र|
उनका उठना बैठना कहना पढिए मात्र||७८४||

दिल अरु दीपक स्नेह से पूरित रखिए नित्य|
दोनो का दिपना भला सर्वोत्तम सत कृत्य||७८५||

सुनते पानी से सदा बुझती दिखती आग|
सावन-भादों की झड़ी लगा रही क्यूँ आग||७८६||

लिख रक्खा था रेत पर मैंने तेरा नाम|
तूफानों ने कर दिया मलियामेट तमाम||७८७||

आया मेरे सामने बैठा गुमसुम-बोल|
आँसू ढुलका भर गया कहा न कुछ जी खोल||७८८||

नीँद नहीं आई हमें घर में बिछे पलंग|
खर्राटा भर भूमि पर सोता रहा मलंग||७८९||

पाश जाल पिंजरा मकाँ कौन करेगा बंद|
जब बंदा हरि-नाम ले निकल पड़ा स्वच्छंद||७९०||


उसके जलवे की कहाँ नाप तोल या आन|
जितनी मेरी सोच है उतनी उसकी शान||७९१||

उसका कूचा भी गजब करता जादूगीर|
कदम पडे तो खो गया मन हो गया फकीर||७९२||

आँधी है तूफान है आफत है उतपात|
उसका रूप सुहावना हरकत में दिन-रात||७९३||

दर्पन के आगे खड़ी निरखे अपना रूप|
भरा भरा सा वो लगे वो खिलती सी धूप||७९४||

उसकी शोखी का खिला महका महका बाग|
या शोला है बर्फ में या शबनम में आग||७९५||

नयनों में चांचल्य है केशों में कौटिल्य|
अधरों में स्मित छिटकता अंग अंग सौशील्य||७९६||

उस श्यामा का देखिये क्या वैज्ञानिक रूप|
गरमी में शीतल लगे जाडे में ज्यों धूप||७९७||


रजनी भर दीया जले दिल जलता दिन रैन|
स्नेह भरे दोनों इसी से रहते बेचैन||७९८||

अब जब दीपक बुझ चुका डाले से क्या तेल|
था इतना ही रौशनी की सत्ता का खेल||७९९||

मिलती नहीं बजार में मोल प्यार की डोर|
अपने भीतर खोजिये उसे बहोर बहोर||८००||

ये वो गाँव जहाँ न है कोई श्रोता मित्र!।
क्या विज्ञापन कीजिये कहिये वस्तु-चरित्र||८०१||


खारा जल ले सिंधु का घन ज्यों मधु बरसात|
त्यों दुर्जन-कटु-वचन सुन संत करें मृदु बात||८०२||

नदियाँ दौड़ी जा रहीं जिस सागर की ओर|
वो खारे जल से भरा जिसका ओर न छोर||८०३||

दूध पिलाए साँप का कहाँ घटे विष-पूर|
जो नैसर्गिक वृत्ति वो कभी न होती दूर||८०४||

अपने वाग-विलास का करते सब गुण-गान|
पर सज्जन पर-भणिति को नित देते सन्मान||८०५||

बीते दुख को बाँध कर मत रखिए निज साथ|
उससे कभी न आयगा अर्थ धर्म यश हाथ||८०६||

सद्ग्रंथों को खोलिए लहिए धर्म-विचार|
धर्मपरायण के लिए खुले स्वर्ग के द्वार||८०७||

सहज भाव से धर्म का करिए पालन मीत!|
सुधरें दोनो लोक अरु कोई हार न जीत||८०८||

पायी जिसने जगत में धन-दौलत निस्सीम|
वही स्वर्ग अपवर्ग है उसका लोक असीम||८०९||

मंगलभवन अमंगलहर हैं श्रीरघुनाथ|
किया मुक्त शिव रूप दे बीसबाहु दशमाथ||८१०||

कामदेव 

त्रिभुवन में जिसकी रहे आज्ञा सदा अभंग|
शक्तिमान जयशील वह परमानंद अनंग||८११||

मानव की परिपूर्णता जिसके चलते सिद्ध|
वो मन्मथ विजयी सदा जहाँ बापुरे सिद्ध||८१२||

प्रेम-रज्जु में बाँधता जो दो जन को नेक|
उस मनोज की परिधि में सारा काम-विवेक||८१३||

कहाँ फूल के बाण हैं कहाँ फूल का चाप|
त्रिभुवन को वो एक ही देता सुख-संताप||८१४||

यद्यपि भस्मीभूत है है तथापि गतिमान|
उस मनसिज की शक्ति का कहाँ न देखा मान||८१५||

जिसके बल कामी-युगल करता विविध विलास|
कामदेव की शक्ति का वह कमनीय हुलास||८१६||

भस्म हुआ भी कर रहा जो निज शक्ति-प्रकाश|
करता वो मानो किलक शिवजी का उपहास||८१७||

जिसके बल प्रमदा-जनों के हैं चाकर दास|
ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी वह सब काम-विलास||८१८||

पिटता तीनों लोक में जिसका डंका घोर|
वंदनीय वह काम है जिसकी शक्ति कठोर||८१९||

हे मनोज! तुझसा न है कोई दूजा योग्य|
तेरे बल पर ही चला आनँद-भोगी-भोग्य||८२०||

काम हाँकता जगत को करता ठेलाठेल|
इंद्र अहल्या घर गया देखो कैसा खेल||८२१||

कामदेव का चढ गया जिसके सिर सरसाम|
औषध मणि या मंत्र की शक्ति वहाँ नाकाम||८२२||