अपनी बात

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Sunday, December 3, 2017

पेट

आज का समय ‘पेट का समय’ है|

जहाँ तक हमारी जानकारी है, पेट सभी प्राणियों में पाया जाता है| जीवन के सारे काम-धाम पेट के चक्कर में ही हुआ करते हैं| सयाने कहते हैं कि मनुष्य के शरीर में दिमाग का वह स्थान होता है जो किसी ज़माने में राज्यों के राजाओं का हुआ करता था| सच बात तो यह है कि आज राजा तो रहे नहीं और दिमाग का हाल यह है कि उस ही तरफ चल पड़ता है जिधर पेट इशारा करता है|

और भी अधिक खुलासा करते हुए कहें तो असल में शरीर के संविधान में पेट की वही महिमा होती है जो आयकर विभाग में वकील की हुआ करती है, राजनैतिक हलकों में पी. ए. की, व्यापार में लॉबीस्टों की या सरकारी दफ्तरों में दलाल की होती है|

भड्डरी भले ही कितना भी चीख-चीख कर कहते रहें कि ‘माता न परसे भरे न पेट’ लेकिन वास्तविकता यह है कि पेट अब माता के परसें से नहीं भरता| माता के परसने से क्या आजकल के समय में तो पेट किसी के परसे नहीं भरता| पेट का कुआँ सारा परसा और बरसा पचा जाता है| पेट का काम बहुत प्रभावशाली होता है| वह जमा किए गए द्रव्य को पचाता है और फिर पोषक तत्व को बाकी अंगो की हैसियत के अनुसार उनके पास पहुँचा देता है|

संरचना के आधार पर पेट कई प्रकार के हो जाया करते हैं| कुछ पेट गोल हांडी जैसे तने हुए होते हैं| इनकी खासियत यह होती है कि चाहे भयानक जलजला आ जाए या बवंडर ही अपनी बाजू तौल ले, ये टस से मस नहीं होते| ये पेट प्रायः बाहर को निकले होने पर भी इतने विश्वसनीय रूप से स्थिर होते हैं कि जरूरत पड़ने पर इनके स्वामी इनका इस्तेमाल एक छोटी-मोटी मेज की तरह भी करते हैं| सारा लेन-देन इन्हीं के नीचे से पूरी संजीदगी और गोपनीयता से हो जाया करता है|

कुछ पेट ताजी ताजी भरी हुई चावल की बोरियों की तरह होते हैं और ढीले-ढाले से होकर नीचे की ओर लटके रहते हैं| इस तरह के पेट अपने मालिक के चारपाई पर करवट लेकर लेटने की समय चारपाई की बाँही से नीचे लटक जाया करते हैं| इस तरह के पेट को धारण करने वाले लोगों में प्रायः पतलून की बेल्ट कसकर बाँधने की आदत हो जाया करती है| सही भी है, ऐसा कौन चाहेगा कि पेट बेल्ट के भीतर से होकर पतलून में घुस जाए और घुटनों तक लटकता हुआ दिखाई दे| अलबत्ता, इस प्रकार के पेट बेल्ट के ऊपर जरूर लटक आया करते हैं| इन पेटों की बहुत बड़ी खासियत यह है कि अगर पतलून की चेन गलती से खुली भी रह गयी हो तो भी ये बेपर्दगी नहीं होने देते| चलते समय ये पेट लचकते हैं, मटकते हैं और रेम्प पर लहराती हुई मॉडल की सी अदा से जलवागीर होते हैं| अगर, खुदा ना खास्ता इनके मालिक को दौड़ना पड़ जाए तो ये तूफानी लहरों पर डोलती हुई बिना मल्लाह की नाव का मंज़र पेश कर देते हैं| इन पेटों की खासियत इनकी आयतन में ही छिपी होती है| इनके भीतर कितना माल जमा है, इसका अंदाजा लगाना साधारण आदमी के बस की बात नहीं होती|

कुछ पेट छाती से शुरू होते हैं और नाभी तक पहुँचते पहुँचते समाप्त हो जाते हैं| हमारे मित्र चकौड़ी दास ऐसे पेट वालों को घटोदर कहा करते हैं| ऐसे पेट प्राय: कम उम्र के तुन्दिलों के हुआ करते हैं| इनके स्वामियों के चलने की अदा निराली हुआ करती हैं| इस किस्म के पेटों के स्वामी प्रायः अपने पेटों को उसी अदा से तान कर चलते हैं जिस अदा से पहलवान लोग अपनी छाती को ताना करते हैं| न्यूटन महोदय के क्रिया-प्रतिक्रिया का सिद्धांत इस मामले में पूरी तरह काम करता है| पेट तानने की क्रिया की प्रतिक्रया स्वरूप शरीर का पृष्ठ भाग स्वत: तन बाहर की और बाहर की और निकल जाता है| यद्यपि ऐसे पेटधारी लोगों के लिए अक्सर जूते के तस्में बाँधना बड़ा भारी दिक्कत का काम हो जाया करता है तथापि उनकी महिमा के चलते उन्हें बाँधने वालों की कभी कमी नहीं रहती| ये तने हुए पेट कभी ढीले नहीं पड़ते| किसी भी तरह से दिल पर जोर न पड़ने देना इनकी विशेषता होती है, जिसका बड़ा लाभ यह होता है कि इनके मालिक किसी भी तरह की भावनाओं के बहकावे में नहीं आते|

ऊपर विवेचित मॉडलों के अलावा भी पेटों के अनेक प्रकार पाये जाते हैं| कुछ पेट शुरू ही नाभी के नीचे से होते हैं| ऐसे पेट सारा जीवन पेंट की बेल्ट के नीचे ही काट देते हैं| इनका भूगोल नेपथ्य में ही प्रच्छन्न भाव से तिरोहित रहा करता है| ये अपना काम चुप-चाप बिना किसी आवाज़ के करते रहते हैं| ये ऐसे पेट होते हैं जो मिस्सों से भरते हैं किस्सों से नहीं| ये वनवासी ऋषियों की तरह अपनी ही दुनिया में रहते हैं और ‘राम नाम जपना, पराया माल अपना’ के अद्भुत समृद्धिकर मन्त्र का जाप करते रहते हैं|

कुछ पेट ऐसे होते हैं जो सामने के बजाय दाएँ-बाएँ अधिक स्थान घेरते हुए प्रतीत होते हैं| जो स्थान प्रजातंत्र में प्रधानमंत्री का होता है या कभी-कभी मुख्य-मंत्री का भी हो जाता है, वही स्थान शरीर में ऐसे पेटों का होता है| ऐसे पेटों के पास चिर-जिघृक्षा का वरदान हुआ करता है| इनके माहात्म्य का क्या कहूँ! इनकी भूख ऐसी होती है जिसमें किवाड़ भी पापड़|

इसके अतिरिक्त भी लोक में तरह-तरह के पेट उपलब्ध हो जाते हैं जिनकी अपनी-अपनी उपयोगिता हुआ करती है|

अब बताता हूँ मार्के की बात, संसार में पेट मनुष्य का बहुत बड़ा सुरक्षा चक्र माना जाता है| मनुष्य अपने सारे पाप अपने पेट पर टाल देता है| तभी तो लोगों को बहुधा यह कहते हुए सुना जाता है कि पापी पेट की वजह से कुकर्म करने पड़ते हैं| हाँ, पेटों के बारे में एक मिथक है कि वे केवल खुराक को पचाते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि कई बार पेट बात को पचाते हैं, राज़ को पचाते हैं और पाप को भी पचाते हैं| इतना ही नहीं, अक्सर दूसरों के पुण्य को भी पचा जाते हैं|

चित्र http://images.jagran.com/naidunia/police_man_29_11_2016.jpg से साभार

Sunday, November 5, 2017

शुभम धीमान: एक नवोदित कवि

आज एक नए कवि से आपका परिचय कराने में मुझे बहुत फख्र महसूस हो रहा है| इस कवि की कुछ कविताओं को एक विद्यालय की पत्रिका में देखा तो चकित रह गया| जाकर मिला तो पता लगा कि ये बरखुरदार तो खूब लिखते हैं, लगातार लिखते हैं|

माना जाता है कि अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र जिन्दगी की सच्चाइयों और हकीकतों से दूर ही रहते हैं| माना जाता है कि उन्हें अपनी दौड़ जीतने के लिए भागने की भी जरूरत नहीं होती| यह नवोदित कवि बहुत कम उम्र का है लेकिन ज़िंदगी के उलझाव और जटिलता को बहुत खूबी के साथ देखता है| कभी-कभी नाराज़ भी दीखता है लेकिन नकारात्मकता का लेश मात्र भी इसके लेखन में दिखाई नहीं देता| समझ की गहराई और गहराई की समझ पाठक को चकित कर देती है| भाषा और शिल्प के लिहाज से अभी थोड़ा कच्चापन है, लेकिन वह भी मन को भाता है| दुनिया के सबसे शानदार पेड़ पर पर लगने वाला मीठे से मीठा फल भी किसी समय कच्चा ही होता है और उसकी खूबसूरती उसके कच्चेपन की चमक में ही होती हैं| 

नाम शुभम धीमान| देहरादून के एक स्कूल की बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला छात्र| देहरादून की हसीन वादियों से बेपनाह मुहब्बत| कवि भी है और मुक्केबाज़ भी| कसरत करने का शौक़ीन|

बातचीत में बताया कि कविताओं का उनकी ज़िन्दगी से बहुत गहरा रिश्ता है। दिल में बहुत कुछ था, कुछ अपनों से शिकायतें थी, कुछ परायों से उम्मीदें, कुछ टूटे सपनों के टुकड़े थे, कुछ अधूरे ख़्वाबों के निशान, किसी का सहारा तलाशते तलाशते जब अपनी ज़िन्दगी से मुलाक़ात हुई तो बातों ने कविताओं का रूप ले लिया। कविताओं ने उनकी ज़िन्दगी को सँवारा है। एक जगह अपने बारे में सोचते हुए लिख ही दिया -

खो जाने में तलाश मेरी ख़त्म हो गयी, 
खोजता था जिसे वो ख़ुशी भस्म हो गयी 
नयी उम्मीद, नए पंख से महसूस हो रहे हैं 
जो रूठे थे मुझसे वो अब करीब हो रहे हैं 
जूनून है, एक फितूर सी अब ज़िन्दगी है 
पहले थी पहेली सी, अब खूबसूरत नज़्म है...

कवि – शुभम धीमान
फेसबुक यू आर एल - https://www.facebook.com/shubham.dhiman.75685962
 मेल  - 416@doonschool.com

शुभम धीमान की तीन प्रतिनिधि कविताएँ -


(१)

कब्रिस्तान


वो दूर पहाड़ी के पैरों पर
बसा एक सूना मैदान है
वहाँ के रंग ज़रा फीके से हैं
न जाने कब से वो वीरान है
वहाँ उस पहाड़ी के पैरों पर
बसा मेरा कब्रिस्तान है|
वहाँ की सुबह में वो धूप नहीं 
जो इंसानों को जगाती है
रातों मे वो बात है
जो दुनिया को डराती है|
कुछ लोग हैं जो वहाँ रहते हैं
न कुछ सुनते हैं, न कुछ कहते हैं
एक दौर था उनका भी
उनका भी एक जमाना था
ख़त्म हो गया सफ़र उनका
उनके किस्से अब बहुत पुराने हैं
नाम खुदा है उनका पत्थर पर
यादगारी पत्थर जो सिरहाने है|
बड़ा गुरूर था उन्हें अपने जीने पर
लेकिन एक दिन अचानक खो गये
रोकर और अपनों को रुलाकर 
यहाँ इस मैदान मे आकर सो गये
अब इस जमाने में
उनके किस्से कौन सुनाता है
सिराहने का पत्थर देखकर ही
उनका नाम याद आता है
समय के पंजे से कौन बच पता है,
यह दिन वक़्त सभी को दिखाता है|
इनकी बातें कोई सुनता नहीं
बस मुझसे ही यह बतियाते हैं
अपनी ज़िंदगी के अधूरे किस्से
मुझे रो-रोकर सुनाते हैं
इनके किस्से सुनकर अकसर
मैं भी रोता हूँ, मुस्कुराता हूँ
इसलिए ही शायद दुनिया को
मैं पागल सा नज़र आता हूँ|
ज़िंदगी ने जब इन्हें छोड़ दिया
तो मैंने इन्हे पास बुलाया था
उस सफ़र से जब यह थककर गिरे
तो मैने ही इन्हे यहाँ सुलाया था
इंसानों से मेरा वास्ता कम है
इन्ही के साथ अब तो बसेरा है
तुम्हारी उस दुनिया मे नहीं 
इसी कब्रिस्तान मे घर मेरा है|
यहाँ मौत का ख़ौफ़ नहीं
वो भी अपने साथ ही बसती है
हमें ज़िंदगी की फ़िक्र नही
उसके बंधनों से आगे अपनी हस्ती है
हमें शोर पसंद नही
खामोशियाँ ही हमें भाती हैं 
सर-सर बहती हुई हवाएँ ही
हमे लोरियाँ सुनाती हैं
दुनिया के लिए यह जगह
मायूसी भारी, सुनसान है
लेकिन यहाँ पर मिलता है जो सुकून
उससे वो सब अनजान हैं
कभी आकर देखे जमाना
कितना हसीन यह कब्रिस्तान है
मिट कर भी आबाद है
यह मेरा कब्रिस्तान है|

(२)

उस पहाड़ पर चढ़ना है मुझे


उस पहाड़ पर चढ़ना है मुझे,
कितने आराम से खड़ा है वहाँ 
न शोर है, न थकान है,
खामोशियाँ और आराम है,
उस पहाड़ पर चढ़ना है मुझे|
साहिलों पर क्या रखा है?
हर मुसाफिर उम्मीद लिए खड़ा है,
साफ़ीना तैयार खड़ा है, लहरों से कोई डरता है,
कोई दूर तक नज़र लगाए किसी का इंतज़ार करता है,
दूर तलक बस दरिया है और सपने हैं, उमीदें हैं 
मुझे उस पहाड़ पर चढ़ना है|
अड़ियल रास्तों से लड़ना है, 
मज़बूत चट्टानों के सीने से गुज़रना है, 
शिखर से ऑंखें लड़ाकर आगे बढ़ना है, 
मुझे उस पहाड़ पर चढ़ना है| 
चोटियाँ मेरे क़दमों के नीचे होंगी,
मेरी सारी कमियाँ मेरे पीछे होंगी,
सुबह से आँख मिलाता नया पहर होगा,
चींटी जैसा छोटा इंसानों का शहर होगा,
तब अपनी कामयाबी की ख़ुशी जताऊँगा मैं, 
बंद होंठों को खोल ज़ोर से चिलाऊँगा मैं,
सारे दाग अपने श्रमजल से मिटाऊँगा मैं,
एक दिन उस पहाड़ पर चढ़ कर दिखाऊँगा मैं|
एक बार सर उठाकर चलना है मुझे,
खोया हुआ रुतबा हासिल करना है मुझे,
बर्बादी के गम में नहीं मरना है मुझे,
फिर से आगे बढ़ना है मुझे,
एक दिन उस पहाड़ पर चढ़ना है मुझे|

(३)

भगवान


यह डगर है अनजान, सफर भी लम्बा बड़ा,
गंतव्य की खोज में तू यहाँ अकेला खड़ा,
पीछे हैं तिमिर के बादल, आगे संसार पड़ा ,
रुक न पलभर राही, हिम्मत से ले कदम बड़ा|
विजन हैं राहें तेरी, कोई न तेरे संग है,
तूफ़ान में तेरी कश्ती है, तू ही साहिल की तरंग है,
न डर अगर कठिन राह हो, राही तू मलंग है,
तू ही जहाँ का रंगसाज़ है, तू ही कुदरत का रंग है|
मंज़िल तेरी एक है, लेकिन अनेक पथ हैं,
बस एक सही राह है, बाकी सब विपथ है,
उस राह को न छोड़ तू, वही राह विजयपथ है
हिम्मत न हार राही, हिम्मत ही तेरा रथ है
पलभर की अँधेरी रात है, फिर दिवस महान है,
क्षितिज की गोद से निकलता, एक नया अहान है,
एक नई रौशनी के लिए, तेरा आज कुर्बान है,
न रुक अगर दीवारें खडीं, तू एक बड़ी चट्टान है|
शिखर की ओर बढ़ चले कदम, अब उन्हें न थाम दे,
मंज़िल तेरी पास है, अब न सफर को विराम दे, 
हौंसलों की दीवार हिल पड़े, पलभर को न आराम दे,
भूल जा सारे दुःख अपने, अपने दर्द को ख़ुशी का नाम दे|
शिखर पर खड़ा तू, लहराता विजयध्वज विशाल है,
अम्बर से बरस रहा अमृत, मिट रहा अकाल है,
मंज़िल तेरे पावों में है, विजयपथ लहू से लाल है,
आरम्भ है नए संसार का, मगर तेरा अंतकाल है|
हर नए ज़माने को जन्म कुछ मस्ताने दे जाते हैं,
उनके बलिदान, उनके कर्म ही अफ़साने लिख जाते हैं
कुछ नहीं ले जाते जहाँ से, सभी को जीवनदान दे जाते हैं,
इन्हीं वीरों को याद करते हैं हम, जिन्हें हम भगवान बुलाते हैं|