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Saturday, September 2, 2017

एक कटोरी चाँदनी एक कटोरी धूप (भाग २) : उमाकान्त शुक्ल के दोहे





कवि – 
श्री उमाकांत शुक्ल
पत्रव्यवहार - 
६०४ संजय मार्गनई मंडीपटेल नगरमुजफ्फर नगरउत्तरप्रदेश|
फेसबुक यू आर एल - 
 मेल 
shukla_umakant@rediffmail.com
दूरभाष 
+९१९९९७८३७०६२




एक कटोरी चाँदनी एक कटोरी धूप (भाग २)

(७-७-२०१७ से ३१-७-२०१७ तक प्रकाशित)

शब्द अर्थ लालित्य रस कल्लोलिनी ललाम|
बुध जन मंजुल भावना कविता मंगल काम||१४६||


शब्द अर्थ मंगल कलस रस निर्मल आनंद|
कवि जन मंजुल भावना कविता हृदयानंद||१४७||


विरह पिता कारुण्य माँ शोक सहोदर भ्रात|
उत्कलिका सखियाँ ललित मैं कविता हूँ तात||१४८||


किसकी ताकत जो मुझे देगा कारागार|
मै वाणी निजतंत्रता का समग्र श्रृंगार||१४९||


वाणी की अवमानना करो न मूरखराज|
उपक्षीण हो जाओगे पूछेगा न समाज||१५०||


वाणी बल सारी कला वाणी बल व्यापार|
वाणी बल भोजन-भजन वाणी बल संसार||१५१||


मुख दरिद्र वाणी बिना घर दरिद्र बिन लोग|
तन-मन अन्हवाए बिना सब दरिद्र बिन जोग||१५२||


कविता रस कादंबिनी मैं आवारागर्द|
ताके राह सदा मिरी सहृदय जन सम्मर्द||१५३||


आँधी हूँ तूफान हूँ निरा गैर पाबंद|
अभी यहाँ हूँ अब वहाँ निघरा भावुक छंद||१५४||


सुर्खी थी अखबार की 'दो दबंग थे एक|
चर्चा तक न हुई कि जब सज्जन एकम एक||१५५||


झंझा एक झपेट में उड़ा ले गयी छान|
नगदी जेवर ले उड़ी छोरी गो कि जवान||१५६||


काव्य-सुधा-रस-माधुरी अनुपम परमानंद|
घ्राण-सौख्य-संवाहिका मलयज-गंध अमंद||१५७||


कुसुम दशन,पल्लव अधर ,चंचल नयन मिलिंद|
यौवन-गुंफित-माधुरी-वल्ली मित्र!अनिंद||१५८||


तापत्रय परिहारक गुरुजन वचन पुनीत|
मनसा वचसा कर्मणा बन्द उँ परम विनीत||१५९||


कोयल!पंचम सुर भरी प्यारी तेरी कूक|
कौन सुने रहते जहाँ अंधे बहरे मूक||१६०||


जन्म मृत्यु वार्धक्य के संवेदन की चोट|
प्यारे!इस संसार में नित्य खोट ही खोट||१६१||


हानि-लाभ जीवन-मरण सुख-दुख एकाकार|
मन संन्यासी हो चला काहे की दरकार||१६२||


तृष्णा-परवश नाचता रहा अभी तक नित्य|
मन वैरागी हो चला सारे भाव अनित्य||१६३||


चल मन!अब वन में रहें अंतर्मुखी निगाह|
भूत-भविष्यत की जहाँ तनिक न होगी चाह||१६४||


लता वृक्ष फूलें फलें पंछी कलरव गान|
वन का मंगल-भावना-सना सुवर्ण विहान||१६५||


सावन काँवड़ कंध धर आया बं बं बोल|
शिवजी की जयकार कर मिसरी शरबत घोल||१६६||


कुआँ खोदने में लगा रहा न जल का सोत|
मिला बिगाड़ी जिंदगी धूल अलग ली पोत||१६७||


भूख भूख का कर रही पीछा सुख संतोष|
हिरन हुए इनसान के भाग कहाँ परितोष||१६८||


क्षमा दया ममता कृपा सारे बंधन तोड़|
अपनी बात बना अरे!करुणा-वरुणा छोड़||१६९||


नगदी जेवर कार घर नौकर-चाकर लोग|
रुतबा वैभव शोहरत सुख दुनियाई भोग||१७०||


रह वन में गर सिद्धियाँ मिलती होतीं यार|
सिद्ध हुए होते सभी सूकर सिंह सियार||१७१||


कर अपने अनुकूल सब गोटी बिठा सुजान|
इधर उधर की छोड़ कर सुख का तान वितान||१७२||


उसकी उस मुसकान का क्या था असर जनाब|
अब जूही अब मोतिया अब थी खिला गुलाब||१७३||


छोटी सी मुसकान ने किया बखेड़ा यार|
जड़-चेतन गड़बड़ हुआ सब फजूल उपचार||१७४||


अजी तनिक मुसकाइये बहुत हुई तकरार|
दरियादिली दिखाइये जी! लाइये करार||१७५||


वह मुसकान गुलाब थी आतिश यह मुसकान|
असरदार दोनों दिखीं तेवर वही ठिकान||१७६||


उस टटकी मुसकान का कहीं न कोई तोड़|
किशन कन्हैया से लगा मनुआ लौ बेजोड़||१७७||


"मृत्यु और अमरत्व के सागर भर कल्लोल|
रहते हैं हर जीव में" ये पग्गू के बोल||१७८||


आँख खुली तो जिंदगी बंद हुई तो मौत|
दोनो मेरे संग ही रहतीं ज्यों दो सौत||१७९||


खींचेंगे इक अवधि तक जीवन मरण समान|

अन्योन्याश्रित भाव से मेरा रथ रहमान!||१८०||

हुआ खून मीठा लगे चिंता करने लोग|
कड़ुआ बन कर ही करो भैया!सब सुख भोग||१८२||

मैं दीपक दूँगा तुझे तब तक पूर्ण उजास|
सूर्योदय होता नहीं जब तक हो न उदास||१८३||

सब दु:खों का मूल है जग में इक अज्ञान|
जो ले जाता नरक तक ठेल ठेल तू जान||१८४||

मैं उड़ान पर था मिला उसका ओर न छोर|
वह अनंत आकाश था मैं पंछी मति-भोर||१८५||

हवा आग पानी धुआँ मैं हरकारा मेह|
पहुँचा सकता प्यार की पाती उसके गेह||१८६||

प्यार हवा है आग है पानी है है धूम|
सुभग सल़ोना मेघ बन उमड़ घुमड़ता झूम||१८७||

प्रेम पंथ काँटों भरा निस्वारथ गंभीर|
कपट-कुलाँटी छोड़ सब सहिये मीठी पीर||१८८||

प्रेम परम परमातमा प्रेम परम आनंद|
प्रेम गीत कविता गजल पढ़ो सुनो सानंद||१८९||

प्रेम गंग धारा अमल प्रेम सुगंध अगूढ़|
प्रेम साध राधा -किशन प्रेम साधना गूढ||१९०||

मुझे मुखौटों ने छला देवदत्त! ता उम्र|
खुल कर पल भर भी नहीं जिया खिसक ली उम्र||१९१||

खुली हवा में उमग कर उड़ना भूला मंद|
सोने के पिंजरे पड़ा मैं हीरामन बंद||१९२||

देख उड़ी आकाश में बादल संग पतंग|
खींच उसे कुछ ढील दे कर थोड़ा सा तंग||१९३||

कविताई की साधना कर तू आठों याम|
शब्द अर्थ रस छंद के बढ़ने दे आयाम||१९४||

सूखे तर्क वितर्क से मुझे न मतलब बुद्ध!
मैं कविता भावप्रवण करती तुझे प्रबुद्ध||१९५||

शब्द अर्थ के दो विहग बैठ काव्य की डाल|
मंजुल मंगल गीतियाँ गा जग करें निहाल||१९६||

रूप सुता वृषभानु का तिस पर मनसिज ओप|
जयति बिहारीलाल का तिस पर चढ़ता चोप||१९७||

यूँ ही चढ़ता रूप था तिस पर मनसिज कांति|
मदिरा सुधा सुगंध की ज्यों हो झिलमिल भ्रांति||१९८||

उसका रूप न पूछिये मधु रितु पूनम चाँद|
चढ़ा चित्त पर एक दम सभी रुकावट फाँद||१९९||

उसका रूप न भुवन में छाया होता कांत|
कला जगत ऊसर पड़ा तपता होता क्लांत||२००||

अपना रूप निहारिये ले दर्पन कर-कंज|

तनिक रीझिये सँवरिये कसिये प्यारे तंज||२०१||

रूप विधाता की कला का सर्वस्व निचोड़|

अंग अंग से झाँक कर कौतुक करे करोड़||२०२||

पंच तत्त्व का रम्यतर संवेदन सुख- सार|

रूप विधाता की कला-प्रतिभा का संभार||२०३||

डुबकी लगा समुद्र में मेघ पखौटे खोल|
बूँदें छिटकाता उड़ा नभ में उत्तर पोल||२०४||

बैठ हवा के अश्व पर आया सीना तान|

बिजली का चाबुक लिये बादल वीर जवान||२०५||

इंद्रधनुष-पटका कसे आन विराजा मेह|

विद्युत की मुसकान भर बाँका साँवल देह||२०६||

बाँध बलाका का पगा गबरू मेघ-किसान|

विद्युत-हल लेकर चला मंगल बजे निसान||२०७||

मोती छाने आसमाँ बदली-छलनी थाम|

लूटो मन आँगन भरो पूरो मंगल काम||२०८||

गरजा बादल दामिनी दमकी मनुआ मस्त|

नीप खिला दौड़ी नदी जगत हुआ उन्मत्त||२०९||

दिल पर गिरतीं बिजलियाँ वियोगिनी के रोज|

रक्षा करते कवच बन उसकी कठिन उरोज||२१०||

सोमवार है दूसरा सावन का सुख धाम|
महाकाल भगवान का भज पावन प्रिय नाम||२११||

विश्वनाथ भगवान की मनुआ जय जय बोल|
उज्जयिनीपति या कि फिर काशीपति बम् बोल||२१२||

मन भीगा भीगे वसन भीगा तपता गात|
ऐसी कभी हुई न थी जैसी यह बरसात||२१३||

गर्जन के सँग उछलता गिरता धारा संग|

बिजली के सँग मचलता मन मेरा बदरंग||२१४||

झड़ी लगी बरसात की मन नाचा घन घोर|

आज पिया सँग खुशी का कोई ओर न छोर||२१५||

वहाँ गरजता बरसता बहता तीव्र प्रवाह|

इधर हमारे देस में सूखा सावन माह||२१६||

ननदी क्या पगला गया तेरा भैया बोल|
बादल बिजली देख जा छिपा सास के खोल||२१७||

खिड़की खोल निहारिये दिशा-वधू का रूप|

प्रौढ पयोधर दामिनी हार प्रगल्भ अनूप||२१८||

गरमागरम पकौड़ियाँ चाय मिष्ट नमकीन|
बारिश में सँग पाइये घर दुख आय कभी न||२१९||

हल्ला हुआ बिहार में आई भारी बाढ|

गाँव मुहल्ला शहर सब मन बैठा डर गाढ||२२०||

मेरे हृदयोद्यान में रोपा पीड़ा-बीज|
तूने जो अब तरु हुआ फूला फला लजीज||२२१||

अमरित अरु हालाहल यदपि सहोदर भ्रात|

तदपि जिलाता एक है अपर मारता तात||२२२||

मैं तो कायल आपकी कृपा-कोर का मित्र|

शत्रु सुरक्षित हैं जहाँ मेरे पूत-चरित्र||२२३||

कोयल क्या कह पायगी वैसी मीठी बात|

चीनी में विष पाग कर कही जो तूने तात||२२४||

झटका एक लगा कि सब ध्वस्त हुआ विश्वास|

माला टूटी बिखरते मोती दिखे उदास||२२५||

दिखा सितारे आसमाँ ललचाने की भूल|

मत कर मैं धरती मेरा आँचल पूरित धूल||२२६||

जानदार कुछ बात तो होगी उसमें यार|
निंदक और प्रशंसक उसके लाख हजार||२२७||

अपनी और चिराग की ताकत तो पहचान|

अरे पतिंगे!व्यर्थ ही गवाँ रहा क्यूँ जान||२२८||

अपनी अपनी निपुणता से मिलती पहचान|

मौत कसौटी गरल की सुधा अमरता जान||२२९||

छाया आतप साथ ही रहते सुख दुख साथ|

जैसा बिधना कर रहा उसे झुकाओ माथ||२३०||

पके पके फल गिर रहे देखो विधि का खेल|

सभी अकेले आए थे जाते सभी अकेल||२३१||

भाषा के उद्यान का हिन्दी खिलता फूल|
जिसकी महक सुहावनी मंजुल मंगल मूल||२३२||

संस्कृत की बिटिया विभव नाना वाग विलास|

हिन्दी भावौदार्य का पावन परम हुलास||२३३||

हिन्दी काव्य विधा ललित उक्ति विचित्र विलास|

अभिव्यंजन वैविध्य का आनन्दप्रद लास||२३४||

गद्य गद्य में भव्यता पद्य पद्य रसवंत|

हिन्दी! तेरे काव्य की भाव भूमि भगवंत||२३५||

शब्द अर्थ रमणीयता रस-संपत कमनीय|

तेरी भाव गभीरता हिन्दी!नित रसनीय||२३६||

वर्ण अर्थ रस छंद सब पाकर तेरी गोद|

लहैं चराचर जगत में हिन्दी! कल आमोद||२३७||

तुलसी भक्ति तरंगिणी सूर प्रेम रससार|

हिन्दी! कबिरा ज्ञान सब तुझ पर सदा निसार||२३८||

हेम हिरन होता नही यह जग जाहिर सोच|
माया ने भगवान की भी की थी मति पोच||२३९||

तू माया जंजाल में थामे भ्रम की रास|

मृगमरीचिका में फँसा कहाँ बुझेगी प्यास||२४०||

तज प्रपंच वैराग्य भज सुख दुख से मुंह मोड़|

भैया जग में है मची आग आग में होड़||२४१||

आनँद- सिंधु बिसार कर गरलांबुधि में कूद|

किस मोती की चाह में फिरता लाँघ हुदूद||२४२||

गैरों से करता रहा दुनिया भर की बात|

खुद से खुद की बात जब हुई अमृत बरसात||२४३||

करना गर अनुराग कर राधा-माधव संग|

बाकी सारे जगत में घुली कुएँ में भंग||२४४||

मन से साधू हूजिये क्या तन रँगता भाइ|

उसकी कर अन्वेषणा जिसकी सकल समाइ||२४५||

दर्पण!तेरे सामने आते आती लाज|
तू सच्चाई बोलता मुझे न उससे काज||२४६||

हे सौन्दर्य-शशाड़्क! नित रहो उठाते ज्वार|

मेरे स्वान्त-समुद्र मे यही एक दरकार||२४७||

छलिया तुझ सा जगत मे दूजा कोइ न रूप!

छीना चैन बना मुझे साहूकार अनूप||२४८||

काल!न तुझ सा है कोई दूजा चोर- डकैत|

पल पल लूटा है मुझे फिर भी खरा टिकैत||२४९||

कपट-कलुष मन मे धरे पूछा कुशल क्षेम|

जैसी तेरी भावना वैसा उसका प्रेम||२५०||

रूप-सरोवर डूबिये या कि प्रेम- रस मग्न|

राधा-माधव- साधना कैसे होगी भग्न||२५१||

प्रीति-सुधा मदमस्त हैं अपने रमते राम|

औध राम काशी शिव वृन्दावन घनश्याम||२५२||

कवि जन के संग बैठिये सुनिये गुनिये बात|
उक्तिविशेष निखारिये कीजै कविता तात||२५३||

उसके सहज विलास ने असहज किया सुजान|

रात चैन पड़ता नहीं दिन विकराल मसान||२५४||

भव भीषण बीहड वन काल विकट बटमार|

आँख खोल जगते रहो जब तक हो भिनसार||२५५||

मृगी प्रसूता वत्स संग बैठी कानन बीच|

उधर गरजता केहरी मृत्यु उलीच उलीच||२५६||

दुख-सुख की है साधना-भूमि मनुज यह देह|

दुख साधे दुख पाइए सुख साधे सुख नेह||२५७||

मन चंचल भौंरा हुआ गुन गुन ठौर कुठौर|

इधर उधर मँडरा रहा व्यर्थ मचाता रौर||२५८||

सोमवार है सावनी तीजा भोलेनाथ!
मालपुए संग खीर लो भंग दूधिया साथ||२५९||

रुत आए पर फूटता कल्ला अपने-आप|
समय बड़ा बलवान है बौने पुण्य-प्रताप||२६०||

इस तृष्णा की टोकनी तभी भरेगी मित्र !

जब बिराग जल पूरिये इसमें परम पवित्र||२६१||

पड़ता चाबुक काल का उन पर जब सरकार !

रुके काम चल दौड़ते घोड़े की रफ्तार||२६२||

सौ आडंबर ओढ़कर कपट-जाल में फांस|

गला रेत विश्वास का कीजै काम खलास||२६३||

भरे पेट पर शोभते यौवन भोग विलास|

मधुशाला में क्या रुचे खाली रखे गिलास||२६४||

प्रिय के पलकों पर लगी गैर अधर की छाप|

देख ठगी सी रह गयी प्रिया सघन संताप||२६५||

'आंटी! अंकल माल में इक आंटी के साथ...'|

वाक्य हुआ पूरा नही उसका ठनका माथ||२६६||

रखिये सपन सम्हाल कर इन्हें न कीजै भंग|
ये चाहत की भूमिका भरिये इनमें रंग||२६७||

जो गूंगा अस्पृश्य है शून्य रूप रस गंध|

तोड़ रहा उस ब्रह्म से प्यारे! सब अनुबंध||२६८||

चाँद उगलता चाँदनी जहर उगलता सांप|

सहज भाव से देखिये क्या सुख क्या संताप||२६९||

मंथन से नवनीत है मंथन से है आग|

उतना मंथन कीजिये जिससे सूता जाग||२७०||

ऊँच-नीच छोटा-बडा मूरख- पंडित भेद|

रत्तीभर रखता नहीं यम की चाल अभेद||२७१||

नित परिवर्तन हो रहा जिसकी चलते चाल|
स्रष्टा पालयिता तथा संहर्ता वह काल||२७२||

आँखों का खुलना कहीं मुंदना कहीं सुजान|

यह सब काल-विलास की छोटी सी पहिचान||२७३||

कितना खिंचा बचा अभी कितना क्या पर्यंत|

काल द्रौपदी-चीर है जिसका आदि न अंत||२७४||

एक हाथ से पालना एक हाथ से ध्वंस|

काल! दयालु कमाल का तेरा करम नृशंस||२७५||

काम बिना सब जगत जड काम चेतना-शक्ति|

धर्म अर्थ सब काम से काम-मूल सब भक्ति||२७६||

भौतिक देह बिना कहां हो त्रिवर्ग का बोध|

आध्यात्मिक विज्ञान का इसके बिना न शोध||२७७||

यह नेमत करतार की कर इससे नित नेह|

तब तक साज सँवार रख जब तक छूटे देह||२७८||

उमड़ घुमड़ कर आरहे पिय-संदेस ले मेह|
शायद आँगन में मेरे बरसे उनका नेह||२७९||

प्रियतम ने परदेस से भेजा होगा पास|

दूत बना कर मेघ को मन! तू हो न उदास||२८०||

क्या संदेसा लायगा बादल बन कर दूत|

खुशी या कि कारुण्य की उच्छ्रित सुरभि अकूत||२८१||

मरुथल से भी है विपुल जिसकी गहरी प्यास|

इक बादल उसकी भला क्या पूरेगा आस||२८२||

बिजली की तड़पन भरी उसकी बुझा पियास|

करा मेघ! अपनी सरस करुणा का आभास||२८३||

प्यासा मन प्यासी धरा प्यासा भुवन असीम|

अनुशासन है प्यास का करना कठिन करीम||२८४||

रोक सकोगे चाँदनी रोक सकोगे धूप|
पर तिसना को रोकना किसके बस में कूप!||२८५||


कल्पवृक्ष के फेर मेें हद करदी सरकार !
आप भूलते जारहे आममरूद अनार||२८६||

तेरे पिंजरे का मियाँ!खुला पड़ा है द्वार|
अचरज जो उड़ता नहीं अपने पंख पसार||२८७
||


साहेब! यह संसार है माना विरस असार|
फिर भी चाहत के भरें इसमें रंग हजार||२८८||


मनुआ! चुटकी भर न कह कड़वी मेरी मान|
विष सूई की नोक-भर भी करता नुकसान||२८९||


भेजा है जग में मुझे रब ने जब दिलदार!
तेरा भरी बहार का क्यूँ न करूँ दीदार||२९०||


रूपादिक को सत्त्व की दे मीठी सी आँच|
ले आनँद संसार का लिखी खुदा की बाँच||२९१||


अनिर्देश्य वह ब्रह्म है अनिर्वाच्य यह प्रेम|
गगन-कुसुम पहला वहीं दूजा साधे क्षेम||२९२||


प्रेम प्रेम है प्रेम की और न कुछ पहचान|
इसके बिन संसार है तपता रेगिस्तान||२९३||

वाणी कुसुम-सुकोमल वाणी वज्र-समान|
इसकी महक लुटाइए तजिए तीर-कमान||२९४


धीरे धीरे कहन की जान पड़ेगी रीति|
जानकार के बैठिए निकट त्याग मन-भीति||२९५
||


उसकी कही सराहिए अपनी कहिए खोल|
मीठी बानी बोलिए कविताई-रस घोल||२९६||


बीती काली रात अब हुआ सवेरा जान|
खिले कमल विकसे कुसुम उडे विहग पर तान||२९७||


चलते चलते आ गए लो आखिरी पड़ाव|
छूटे सब पीछे मिले जो चढ़ाव उतराव||२९८||

'प्यासा गया जहान से वह बंदा परलोक'|
यही सोच तिल- अंजली उसे दे रहा लोक||२९९||


मन में हो कि न हो वहाँ मेरे तई पियार|
"आइ लव् यू" के रिवाज पर वे करते इजहार||३००||